किसान-आदिवासियों की पालघर में जीत, राज्य स्तरीय आंदोलन जारी
महाराष्ट्र में किसान-मज़ूदर और आदिवासियों की मांगों और समस्याओं को लेकर सीपीएम यानी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी और उससे जुड़े संगठनों के आंदोलन को पहली जीत मिली है। प्रशासन ने प्रमुख स्थानीय मांगों को लिखित में स्वीकार कर लिया हैं जिसके बाद पालघर जिला कलेक्ट्रेट का घेराव स्थगित कर दिया गया है। लेकिन राज्य-स्तरीय मांगों के लिए आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया गया है।
Palghar District Collectorate Gherao Suspended and Victory Celebrated after Key Local Demands accepted in Writing!
Agitation for State-level Demands will Continue pic.twitter.com/NIx2MBXC2G— CPI (M) (@cpimspeak) January 22, 2026
पालघर ज़िले के सभी तहसीलों से आए हज़ारों लोगों के साथ यह पैदल मार्च सोमवार 19 जनवरी को दहानू तहसील के चारोटी से शुरू किया गया थो जो पालघर ज़िला कलेक्टरेट तक पहुंचा। जहां पुलिस ने इन्हें रोक लिया जिसके बाद यह लोग वहीं धरना देकर बैठ गए।
सीपीआई-एम के अनुसार इस मार्च में करीब 50 हज़ार लोग शामिल हुए। आंदोलनकारियों का कहना था कि वे पालघर कलेक्टरेट पर तब तक धरने पर बैठेंगे जब तक सरकार उनकी पुरानी और नई सभी मांगों को लिखित रूप में और स्पष्ट समय-सीमा के साथ मान नहीं लेती।
इस मार्च और धरने में अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS), भारतीय केंद्रीय ट्रेड यूनियन (CITU), अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (AIDWA), डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच (AARM) जैसे जनसंगठन बड़ी संख्या में शामिल हुए।
आंदोलन का नेतृत्व सीपीआई(एम) पोलित ब्यूरो सदस्य और AIKS के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अशोक धवले, AIDWA की राष्ट्रीय महासचिव मरियम धवले, AIKS के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डॉ. अजित नवले, CITU के राज्य सचिव विनोद निकोले, दहानू से दो बार के विधायक और AARM के राज्य संयोजक किरण गहला सहित कई नेताओं ने किया।
आंदोलन की प्रमुख मांगें इस तरह थीं--
वन अधिकार क़ानून और पेसा क़ानून को सख़्ती से लागू किया जाए
मंदिर और सरकारी जमीनों को वास्तविक जोतदारों के नाम किया जाए.
लेबर कोड्स को वापस लिया जाए
मनरेगा को पूरी तरह बहाल किया जाए
स्मार्ट मीटर योजना रद्द की जाए
वधावन और मुर्बे बंदरगाह परियोजनाएं रद्द की जाएं
पीने और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जाए
शिक्षा, रोज़गार, राशन, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाएं बढ़ाई जाएं
महाराष्ट्र में सीपीआई-एम और उसके जनसंगठनों ने पहले भी कई बड़े लॉन्ग मार्च किए। 2018 और 19 में नासिक से मुंबई तक, 2023 में अकोले से लोनी तक मार्च किए गए, लेकिन विडंबना है कि सरकार हर बार सिर्फ़ आश्वासन देकर आंदोलनकारियों को टाल देती है और उन्हें फिर पुरानी मांगों को पूरी कराने के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है। लेकिन अब आंदोलनकारी शासन-प्रशासन की रणनीति समझ रहे हैं इसलिए वह अपनी मांगों के संबंध में लिखित में स्पष्ट समय-सीमा मांग रहे हैं। पालघर में तो लिखित आश्वासन मिला है अब देखना है कि राज्य स्तरीय मांगों के संबंध में सरकार क्या फ़ैसला लेती है।
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