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ख़बरों के आगे-पीछे: भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर कांग्रेस की बड़े आंदोलन की तैयारी!

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन भारत-अमेरिका ट्रेड डील, पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे की किताब और विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों की भूमिका समेत कई मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।
INDIA-US DEAL
फ़ाइल फ़ोटो। भारत-अमेरिका ट्रेड डील के ख़िलाफ़ संसद परिसर में प्रदर्शन करते विपक्षी सांसद

 

राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर 

पूर्व सेनाध्यक्ष एम.एम. नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर उठे विवाद के बाद अब खबर है कि केंद्र सरकार पूर्व सैन्यकर्मियों की किताब के प्रकाशन के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार कर रही है। इस बारे में रक्षा मंत्रालय में हाल में बैठक हुई, जिसमें ऐसे मामलों में सरकारी गोपनीयता कानून के प्रावधानों को भी लागू करने पर विचार हुआ। दरअसल, कार्यरत सैन्यकर्मियों के मामलों में तो विभिन्न वैधानिक एवं सेवा संबंधी शर्तें लागू होती हैं, लेकिन रिटायर्ड सैन्यकर्मियों की किताबों का प्रकाशन रोकने का कानून तो दूर, सेवा संबंधी नियम भी तय नहीं हैं। 

सरकारी सूत्रों का दावा है कि रिटायर्ड सैन्यकर्मी भले सेना कानून या सेना के नियमों से बंधे हुए ना हों, मगर गोपनीयता संबंधी नियम उन पर भी लागू होते हैं। मगर मुद्दा यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा एवं उसके संदर्भ में गोपनीय सूचनाओं की परिभाषा कौन तय करेगा? क्या नए नियम-कायदे राजनीतिक आम सहमति से तय होंगे या सत्ता पक्ष खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा का एकमात्र प्राधिकारी मानते हुए नियम तय कर देगा? 

यह समझ समस्याग्रस्त है कि सेना में अपनी पूरी कामकाजी जिंदगी गुजारने वाले व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा की परवाह नहीं करते अथवा सत्तासीन लोग विपक्षी दलों की तुलना में राष्ट्रीय सुरक्षा के अधिक बड़े पहरुआ हैं। दरअसल, अधिकतम पारदर्शिता किसी सिस्टम के अंदर मौजूद कमियों दूर करने में अधिक सहायक होती है। किसी किताब से ऐसा प्रकरण या आम चलन सार्वजनिक होता है, जिससे नुकसान हुआ हो, तो उसे सामने आने देना चाहिए। उस पर पर्देदारी से तो राष्ट्रीय सुरक्षा कहीं अधिक क्षतिग्रस्त होगी।

गांधी को भी एआई से बचाने की ज़रूरत

देश के तमाम फिल्मी सितारे अपनी स्टाइल, अपनी आवाज और अपने संवाद के किसी भी रूप में इस्तेमाल पर अदालत से रोक लगवा रहे हैं। सबसे पहले जो अभिनेता इसके लिए अदालत पहुंचे थे उनमे एक अमिताभ बच्चन भी थे। बाद में तो सलमान खान से लेकर अजय देवगन और अभिषेक बच्चन से लेकर ऐश्वर्या राय बच्चन तक सबने अदालत में गुहार लगाई और अपने पक्ष में आदेश प्राप्त किया। 

अदालतों ने आदेश दिया है कि कोई भी व्यक्ति इन अभिनेता, अभिनेत्रियों के स्टाइल की नकल बिना अनुमति के नहीं करेगा। लेकिन फिल्मी सितारों से ज्यादा जरूरत महात्मा गांधी को ऐसी चीजों से बचाने की है। पिछले महीने महात्मा गांधी की पुण्यतिथि 30 जनवरी के आसपास कांग्रेस और भाजपा दोनों की ओर से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए महात्मा गांधी की तस्वीर का इस्तेमाल करके एक दूसरे के खिलाफ संदेश प्रसारित कराया गया। किसी वीडियो में ऐसा लगा, जैसे महात्मा गांधी भाजपा के लिए प्रचार कर रहे हैं तो किसी में लगा कि वे भाजपा की आलोचना कर रहे हैं। इस किस्म के एआई जेनरेड वीडियो के खिलाफ कई सामाजिक संगठनों और गांधीवादी संस्थाओं ने साइबर अपराध शाखा को शिकायत दर्ज कराई। असम कांग्रेस ने भी इसकी शिकायत की। लेकिन यह सिर्फ पुलिस का मामला नहीं है। सभी पार्टियों और सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। 

व्यापार संधि के ख़िलाफ़ उतरेगी कांग्रेस

लगता है कि कांग्रेस जो काम मनरेगा बचाओ आंदोलन में नहीं कर पाई, वह अमेरिका के साथ व्यापार संधि के मामले में करना चाहती है। राहुल गांधी ने इसका माहौल बना दिया है। उन्होंने चार दिन तक लगातार सोशल मीडिया में व्यापार संधि की शर्तों को लेकर सरकार पर हमला किया। राहुल ने सबसे ज्यादा किसानों के मुद्दे पर फोकस किया। किसानों ने केंद्र सरकार के तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस कराया। उसके बाद प्रधानमंत्री ने किसानों से जो वादा किया वह चार साल बाद आज तक पूरा नहीं हुआ है। 

दूसरी बात यह कि किसानों के संगठन भी मान रहे हैं कि अमेरिका के साथ हुई व्यापार संधि से किसानों को नुकसान होगा। इसीलिए कांग्रेस इस संधि के खिलाफ देश भर में प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। मार्च में इस प्रदर्शन का ऐलान हो सकता है। मार्च में ही इस व्यापार सौदे पर दोनों देश दस्तखत करने वाले हैं। उससे पहले कांग्रेस इस मसले पर आंदोलन की रूपरेखा बनाने के लिए पार्टी नेताओं के साथ बैठक करेगी। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के पार्टी नेताओं से राहुल गांधी और खड़गे की मुलाकात होगी। राहुल ने सबसे पहले कपास किसानों का मुद्दा उठाया था। इस लिहाज से महाराष्ट्र के नेताओं से उनके मिलने का संदर्भ समझ में आ रहा है। बाकी राज्य भी खेती किसानी वाले राज्य हैं। अमेरिका और न्यूजीलैंड के सेब के लिए भारत का बाजार खोलने से सेब उत्पादक भी परेशान है। इसीलिए हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में आंदोलन की तैयारी हो रही है।

हरदीप पुरी का जाना तय है!

एप्सटीन फाइल से विवादों में आए हरदीप पुरी का मामला हालांकि धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है। उनके खिलाफ मोर्चा खोलने वाली तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा के हमले की तीव्रता भी कम हो गई है, कांग्रेस का हमला जारी है। पवन खेड़ा और सुप्रिया श्रीनेत इस मुद्दे को उठाए हुए है। उनका कहना है कि एपस्टीन से पुरी 14 बार मिले हैं। बहरहाल, विपक्षी पार्टियों की ओर से हरदीप पुरी के खिलाफ जो भी अभियान चल रहा हो लेकिन सत्तापक्ष की ओर से ऐसी खबरें आ रही हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरा समर्थन पुरी को है। वे कम से कम फिलहाल इस मसले पर पुरी का इस्तीफा नहीं लेने जा रहे हैं। उन्होंने पिछले हफ्ते 15 फरवरी को हरदीप पुरी को जन्मदिन की बधाई देकर भी संकेत दे दिया था कि सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है।

हालांकि जानकार सूत्रों का कहना है कि मई या जून में जब प्रधानमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद में फ़ेरबदल करेंगे तब पुरी की विदाई हो जाएगी। गौरतलब है कि हरदीप पुरी का राज्यसभा का कार्यकाल इस साल नवंबर में खत्म हो रहा है। अभी वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सदस्य हैं और कहा जा रहा है कि उन्हें फिर से उच्च सदन में नहीं भेजा जाएगा। मी टू में फंसने के बाद एमजे अकबर भी ऐसे ही इस्तीफा देकर हटे थे और जल्दी ही राज्यसभा में उनका कार्यकाल खत्म हुआ तो उसके साथ ही उनके राजनीतिक करियर पर भी विराम लग गया।

देखा-देखी रंग बदलते राज्यपाल

जैसे खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है वैसे ही इन दिनों राज्यपाल भी एक दूसरे को देख कर रंग बदल रहे हैं। राज्यपालों का इस साल का रंग विपक्षी पार्टियों के शासन वाले राज्यों में अभिभाषण नहीं पढ़ने का है। एकाध अपवाद को छोड़ कर विपक्षी शासन वाले सभी राज्यों में राज्यपालों ने अभिभाषण नहीं पढ़ा या दो चार लाइन पढ़ कर छोड़ दिया। पहले कभी ऐसा अपवाद के तौर पर हुआ था। अब यह मुख्यधारा की बात हो गई है। 

यह तो सब जानते हैं कि राज्यपाल राजनीतिक व्यक्ति होते हैं और केंद्र सरकार के एजेंट के तौर पर काम करते हैं। फिर भी आमतौर पर राज्यपाल न्यूनतम मर्यादा और नैतिकता का निर्वाह करते हुए कम से कम तटस्थता दिखाने की कोशिश जरूर करते थे। लेकिन अब राज्यपाल ने वह शर्म, लिहाज, नैतिकता आदि का चोला पूरी तरह से उतार दिया है। तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने इस साल के पहले विधानसभा सत्र में अभिभाषण नही पढ़ा। उनकी देखा-देखी केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने भी नहीं पढ़ा। फिर उनकी देखा-देखी कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने भी पूरा अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर दिया। अब हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने भी दो-चार लाइन पढ़ कर अभिभाषण छोड़ दिया। राज्य सरकार की ओर से लिखा गया अभिभाषण पढ़ना राज्यपाल का संवैधानिक दायित्व है। लेकिन राज्यपालों ने इसे तमाशा बना दिया है। यह तमाशा वहीं होता है जहां भाजपा विरोधी पार्टी की सरकार है। भाजपा शासित राज्यों में ऐसा नहीं हो रहा है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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