बिहार-झारखंड: यूजीसी गाइडलाइंस के समर्थन में छात्र-युवा सड़कों पर उतरे
दो फ़रवरी की दोपहर पटना गांधी मैदान के दक्षिणी छोर की सड़क पर माहौल उस समय बेहद तनावपूर्ण हो गया जब ‘यूजीसी इक्विटी बिल लागू करो’ की मांग को लेकर छात्र-युवाओं के जुलूस पर पुलिस ने लाठियां चलायी। हाथों में अपनी मांगों की तख्तियां लेकर वे शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ना चाह रहे थे लेकिन भारी संख्या में तैनात पुलिस बल ने सड़क पर बैरिकेटिंग लगाकर रास्ता रोक रखा था।
वहां मौजूद मीडिया वाले तो “ब्रेकिंग न्यूज़ सनसनी” दिखाने की होड़ में मानो प्रदर्शनकारियों बनाम पुलिस के बीच “युद्ध कराने” पर तुले हुए थे। लाइव प्रसारण कर रहे अधिकांश एंकर चीख़ चीख़ कर कमेंट्री करते हुए कह रहे थे- देखिये-देखिये, पुलिस और छात्रों में झड़प शुरू हो गयी। एक एंकर तो पुलिस और छात्रों में घमासान शुरू होने की भी जानकारी दे रहा था। गोया विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्र-युवा वहाँ कोई सुनियोजित हिंसा-टकराव करने के लिए ही वहाँ पहुंचे थे।
बहरहाल, “मीडिया सनसनी” से परे, ‘कैम्पसों में जारी भेदभाव को रोकने के लिए यूजीसी द्वारा जारी रेगुलेशन के समर्थन में देश के अन्य हिस्सों में जारी अभियान के रूप में विभिन्न छात्र-युवा संगठनों के आह्वान पर यहाँ भी जुटान हुआ था। जो पटना कॉलेज से जुलूस की शक्ल में गांधी मैदान स्थित जेपी-गोलंबर तक मार्च करते हुए जा रहा था। लेकिन मार्च समाप्ति स्थल के पहले ही भारी पुलिस बल द्वारा बैरिकेटिंग कर रास्ता रोक दिए जाने से छात्र क्षुब्ध हो गए थे। प्रदर्शनकारी छात्रों द्वारा जारी सोशल मीडिया वीडियो में ये दिखाया जा रहा था कि पुलिस कैसे निहत्थे छात्र-युवाओं के साथ धक्का-मुक्की और लाठियां चलाकर जबरन हिरासत में लेकर गाड़ियों में ठूँसकर ले जा रही थी।
देखा जाय तो ‘यूजीसी रेगुलेशन लागू करने’ की मांग कर रहे छात्र-युवाओं का आक्रोशित होना गलत नहीं प्रतीत होता है। क्योंकि जब यूजीसी का नया रेगुलेशन जारी हुआ था और तथाकथित “सामान्य वर्ग” के प्रतिनिधि इन्हीं सड़कों पर उतरकर “रेगुलेशन रद्द करने” की मांग लेकर हंगामा कर रहे थे तो यही पुलिस सहयोगी की भूमिका में खड़ी थी।
ख़बरों के अनुसार ‘यूजीसी 2026 के विनियमों’ पर सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित संज्ञान लेकर महज कुछ दिनों के अन्दर “अंतरिम रोक” लगाने का फैसला दे दिया। जो अब काफी “विवादास्पद” रूप लेता जा रहा है। तथाकथित “सामान्य वर्ग” खुश है कि कोर्ट उनके मनोनुकूल काम कर रहा है। लेकिन ओबीसी-एसटी-एससी समुदायों के छात्र-युवा कोर्ट के फैसले और उसकी दलीलें से आहत होकर “न्यायपालिका की निष्पक्षता” पर सीधे सवाल भी खड़े कर रहे हैं।
इसका नज़ारा पटना में प्रदर्शनकारी छात्र-युवाओं के आक्रोश भरे शब्दों में दिखा भी। आप जानते हैं कि खुद यूजीसी द्वारा सर्वे के आंकड़े बता रहे हैं कि 2019 से 2024 के बीच देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत वृद्धि हुई है।
न्यायपालिका को संबोधित करते हुए छात्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि- जाति और नस्लीय भेदभाव कोई मनगढ़ंत अवधारणा या बीती बात नहीं हैं। वे हमारे शैक्षणिक संस्थानों और पूरे समाज में रोज़मर्रा की क्रूर सच्चाई हैं।
क्या "जातिविहीन समाज" बोल देने भर से रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी की संस्थागत हत्या या एंजेल चकमा की नस्लीय हत्याओं के विरुद्ध न्याय मिल जायेगा?

गौर तलब है कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई होनी है, देखना है कि अब उसमें कौन सा नया फैसला सामने आता है। लेकिन इस मुद्दे पर देश भर के छात्र-युवाओं की एक विशाल आबादी प्रायः हर दिन कहीं न कहीं सड़कों पर जुलूस-प्रदर्शनों का सिलसिला लगातार जारी रखे हुए है।
बीते 31 जनवरी को वामपंथी छात्र-युवा संगठन इंक़लाबी नौजवान सभा और आइसा के संयुक्त पहल पर ‘यूजीसी रेगुलेशन लागू’ करने की मांग को लेकर राष्ट्रव्यापी अभियान संगठित किया गया।’अत्याचार अधिकार नहीं, जातीय भेदभाव को वैध ठहराना नहीं चलेगा- ‘यूजीसी गाइडलाइंस लागू करो, रोहित एक्ट लागू करो!’ के नारों के साथ प्रतिवाद प्रदर्शित किये गए।
बिहार की राजधानी पटना समेत प्रदेश के कई इलाकों में यह अभियान चलाया गया। भोजपुर और सिवान में तो विशाल रैली निकाल कर पूरे नगर का परिभ्रमण किया गया।
डुमरांव में छात्र-युवाओं के अभियान को संबोधित करते हुए इनौस के राज्य अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक अजित कुशवाहा ने अपने संबोधन में ‘यूजीसी रेगुलेशन’ पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि बीते दिनों देश में कई कई बड़े आन्दोलन और अभियान चलाये गए लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कोई संज्ञान नहीं लिया। सबने देखा कि देश भर के किसान महीनों अपनी मांगों के लिए आवाज़ उठाते रहे अथवा एसआईआर पर जनता इन्साफ मांगती रही, किसी पर भी कोई संज्ञान नहीं लिया गया। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि “मुट्ठीभर तथाकथित “सामान्य वर्ग” के लोगों ने आवाज़ उठायी तो झट से सक्रिय होकर आनन-फानन में फैसला दे दिया गया। देश के लोग इसका क्या मतलब समझें? हम उम्मीद करते हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट आनेवाले समय में देशभर के बहुसंख्य छात्र-युवाओं की संवैधानिक जन आकांक्षा पर भी संज्ञान लेगी।
कई कार्यक्रमों में वक्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि- यह सब भाजपा और न्यायपालिका की मिलीभगत से किया जा रहा है। क्योंकि भाजपा-राज जिस हिन्दू-राष्ट्र निर्माण की कवायद में अपनी पूरी ताक़त लगाए हुए है, उसका लक्ष्य ही है इस देश में “मनुवादी दर्शन-सिद्धांत” को थोपकर “वर्णवादी व्यावस्था” फिर से स्थापित करना। इसीलिए 2014 के बाद से देश के समदर्शी संविधान और स्थापित लोकतंत्र को समाप्त करने की कोशिशें लगातार बढ़ती जा रही हैं।

झारखंड में भी रांची के अलावा कई स्थानों पर छात्र-युवाओं ने ‘यूजीसी रेगुलेशन’ लागू करने की मांग को लेकर अभियान संगठित किया गया।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक कार्यकर्ता है।)
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