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कटाक्ष: शुक्र है बापू, तुम ना हुए !

बापू बिना रुके कदम बढ़ाते हुए बोले– इससे पहले कि यह सालाना नाटक शुरू हो, मैं कहीं निकल जाना चाहता हूं। मुझे कम से कम इस पाखंड का हिस्सा नहीं बनना है।
GANDHI JI

एक तो 30 जनवरी की तारीख के बावजूद, तीस जनवरी वाली कोई बात नहीं थी। न मुकर्रर वक्त पर साइरन के जरिए पुकार और न जगह-जगह लाउडस्पीकरों से ‘‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’’ की गुहारें। 

उस पर सुबह-सुबह शांति वन पहुंच कर जो देखा, हैरान करने वाला था। बापू अपने चर्चित लंबे डग भरते हुए तेजी से वृक्षों के झुरमुट की ओर भागे से जा रहे थे। दूर से ही उनकी ओर बढ़ते हुए पूछा, इतनी सुबह उधर कहां अंधेरे की तरफ भागे जा रहे हैं और वह भी अपने पुजाने के दिन पर। साल में दो ही दिन तो आप को याद किए जाने के बचे हैं। दो अक्टूबर और तीस जनवरी। आज तो आपका नाम लेने वालों से लेकर, गोडसे का काम करने वालों तक, तमाम गद्दीधारी आपके ठिकाने पर आने वाले हैं और आज ही आप...। 

बापू बिना रुके कदम बढ़ाते हुए बोले--इसीलिए तो...। इससे पहले कि यह सालाना नाटक शुरू हो, मैं कहीं निकल जाना चाहता हूं। मुझे कम से कम इस पाखंड का हिस्सा नहीं बनना है।

पत्रकारीय उत्सुकता अब और जोर मारने लगी। मैंने भी पीछा नहीं छोड़ा। यह कहते हुए पीछे-पीछे चलता रहा कि आप को अपनी पूजा कराने का शौक कभी नहीं था, यह तो सभी जानते हैं। दिखावे की पूजा कराने का तो हर्गिज नहीं। फिर भी आप का यह मानना क्या अन्याय ही नहीं है कि राज करने वालों का आपकी मूर्ति पर/ तस्वीर पर फूल चढ़ाना, आपके आगे सिर झुकाना कोरा दिखावा ही है। संदेह का लाभ तो सभी को मिलना चाहिए। राज करने वाली पार्टी में सभी गोडसे भक्त थोड़े ही हैं। उनके यहां भी तो थोड़ी-बहुत वैराइटी तो होगी ही। हमें तो लगता है कि सच्चे गोडसे भक्त तो पहचान छुपाकर, जुबान चलाने वाले सोशल मीडिया हिंदू योद्धा ही ज्यादा हैं। वर्ना मोदी जी तो दुनिया में जहां भी जाते हैं, खोजकर आपकी प्रतिमा पर शीष नवाते हैं। और आप हैं कि दुनिया के ज्यादातर देशों में उन्हें मिल भी जाते हैं। फिर यह बहिष्कार...?

बापू समझ गए कि आसानी से उनका पीछा नहीं छूटने वाला है। रुक कर एक पेड़ के नीचे बने टूटे-फूटे चबूतरे पर बैठ गए। इशारा कर के मुझे भी बैठने का कहा। फिर कहने लगे कि तुझे क्या लगता है कि मुझे इसकी परवाह है कि कौन वाकई मेरी पूजा करता है और कौन गोडसे की? और वह भी इसलिए कि गोडसे ने मेरे सीने पर तीन गोलियां दाग कर मेरी हत्या की थी? या मुझे इसकी परवाह है कि पिछले अठहत्तर साल में तीस जनवरी का दिन, शहादत या बलिदान दिवस से शुरू होकर, पहले पुण्यतिथि हुआ और अब सिर्फ जयंती या सालगिरह रह गया है? यहां तक कि अहिंसा दिवस, स्वच्छता दिवस, शराबबंदी दिवस, आदि में आदि में से कुछ भी।  मुझे गलत मत समझना। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मुझे इस सबसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता है। बेशक, मुझे भी फर्क पड़ता है, लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी के तौर पर मुझे फर्क नहीं पड़ता है। मुझे फर्क पड़ता है, देश के बापू के रूप में। मुझे फर्क पड़ता है तो इसलिए कि इससे देश को फर्क पड़ता है।

मेरे चेहरे पर मेरा प्रश्न साफ लिखा था--कैसे? बापू अपने लोकख्यात धीरज से हाथ पकड़ कर समझाने लगे। तू तो पत्रकार है, उत्तराखंड वाले ताजा किस्से का तो तुझे पता ही होगा। कहने को देवभूमि है और बड़ी तेजी से राक्षस-भूमि बनने की राह पर फिसल रही है। कोटद्वार में एक दुकान के नाम पट्ट पर लिखा है बाबा। पर उसका मालिक मुसलमान है। बस इसी का बहाना लेकर भगवाधारी झुंड बनाकर उसकी दुकान बंद कराने के लिए पहुंच गए। बाबा शब्द तो हमारा है। मुसलमान की दुकान का नाम बाबा नहीं रहने देंगे! लगे उपद्रव करने। पुलिस थी, पर हस्ब ए मामूल, तमाशा देखने की ड्यूटी पर। पर उनके तोड़-फोड़ कर पाने से पहले, दीपक नाम का एक पहलवान उनके और बाबा की दुकान के बीच दीवार बनकर खड़ा हो गया। एलान कर दिया कि मेरा नाम मोहम्मद दीपक है और न दुकान को हाथ लगाने दूंगा और न दुकानदार को। भगवाधारी झुंड ऐसी धर्मनिरपेक्षतावादी रुकावट के लिए तैयार नहीं था, पीछे लौट गया। तमाशा खत्म तो पुलिस भी घर चली गयी। पर धामी जी के राम राज्य में कहानी इतने पर खत्म कैसे हो जाती? अगले दिन भगवाई और बड़े झुंड में और पूरी तैयारी के साथ अपने धार्मिक यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षस, दीपक को निपटाने पहुंच गए। जी भरकर उन्हें और उनके परिवार को गालियां दीं और हंगामा किया। पुलिए एक बार फिर तमाशा देखती रही! अब जिन धामी जी की पुलिस के अशीर्वाद से आए दिन ऐसा ही कुछ न कुछ हो रहा है, वह तीस जनवरी को मुझे पूजने का स्वांग करें और मैं उनसे फूल चढ़वाऊं, अब बर्दाश्त नहीं होगा।

मैंने कहा पर एक के लिए सब को...? बापू ने झिडक़ते हुए कहा, यह तो एक उदाहरण है। यहां तो पूरा का पूरा अवा ही बिगड़ा हुआ है। सुना नहीं असम का हिमंता बिस्व सरमा किस के नाम पर चुनाव जीतना चाहता है। इसके नाम पर कि वह मियां लोग को इतना परेशान करेगा कि देश छोडक़र भाग जाएंगे! क्या मैं उससे श्रद्धा-सुमन चढ़वाऊं? या उत्तर प्रदेश वाले योगी से, जिसका चोला साधु का, गद्दी मुख्यमंत्री की और काम...। अब तो अदालत ने भी कह दिया है कि आपरेशन लंगड़ा चलवाकर अगले ने आठ साल में 11 हजार लोगों को पांव में गोली मार कर लंगड़ा कराया है। उससे अपनी अहिंसा का सम्मान कराऊं? या ओडिशा के मांझी से, जिसके राज में बंगालियों को बाकायदा मॉब लिंचिंग में मारा जा रहा है या पुलिस द्वारा जबरन बांग्लादेश में धकेला जा रहा है।

मैंने आखिरी दलील दी--पर मोदी जी? अब बापू ने थोड़ा नाराजी से घूरा! इस ब्रह्मांड को चलाने वाला कौन है? यह तो पूरे आस्तिकों का ब्रह्मांड है, जिसका सृष्टा, कर्ता, संचालक, सब एक है!

इसके बाद मैं क्या कहता? फिर भी उठते-उठते मैंने अपने हिसाब से चतुराई की सलाह दी। आपके गायब हो जाने से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उल्टे आप के गायबाने में ये आप की जगह पर किसी और को बापू बनाकर बैठा देंगे, पर अपने कर्म-कांड और आचार-व्यवहार, दोनों में जरा सा खलल नहीं पड़ने देंगे। बापू उठकर लंबे डग भरकर पेड़ों  के झुरमुट में अदृश्य होने की ओर बढ़ते चले गए--पीछे आवाज सुनाई दी, इसीलिए तो मेरा इनसे दूर रहना और भी जरूरी है, अच्छा है!

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं) 

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