नव-फ़ासीवाद, राष्ट्र की अवधारणा और SIR
भारत में नव-फासीवाद (neo-fascism) के उभार के दौरान, उससे जुड़ी कुछ विशेषताएं बहुत ही स्पष्ट रूप में अभिव्यक्त हुई हैं। ये बहुत ही आसानी से दिखाई देने वाली विशेषताएं हैं: असहाय अल्पसंख्यक समुदाय का ‘‘पराया’’ बनाया जाना और बहुसंख्यकों के बीच उसके प्रति नफरत पैदा किया जाना। इस अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों पर, शासन के आलोचकों पर, राजनीतिक विपक्ष पर, बुद्धिजीवियों पर, कलाकारों पर तथा अन्य पर शासन के अंगों और फासिस्ट गुंडों, दोनों के ही द्वारा दमनचक्र चलाया जाना। और इजारेदार पूंजी (monopoly capital) द्वारा और खासतौर पर इजारेदार पूंजी के एक नवीनतर तबके द्वारा खुल्लमखुल्ला, खालिस वर्गीय शासन।
राष्ट्र की अवधारणा ही शीर्षासन की मुद्रा में
ये सभी सामान्य रूप से फासीवादी विशेषताएं, नव-फासीवाद के उभार के साथ आज भारत में खुल्लमखुल्ला देखी जा सकती हैं। लेकिन, इसके अलावा नव-फासीवाद की एक और कम स्वत:स्पष्ट किंतु महत्वपूर्ण विशेषता भी भारत में देखने को मिल रही है, जिस पर अब तक विशेष चर्चा नहीं हुई है। इसका संबंध राष्ट्र की अवधारणा मात्र से है।
भारत जैसे देशों में, उप-निवेशवादविरोधी संघर्ष के बीच राष्ट्रवाद की जो अवधारणा विकसित हुई थी, यूरोप में वेस्टफेलियाई शांति संधियों की पृष्ठभूमि में जो राष्ट्रवाद विकसित हुआ था, उससे बुनियादी तौर पर भिन्न थी। राष्ट्रवाद की भारतीय अवधारणा ने, अपने यूरोपीय समकक्ष के विपरीत किसी ‘‘अंदरूनी शत्रु’’ की पहचान नहीं की थी। यह अवधारणा साम्राज्यवादी नहीं थी, जो कि हद से हद इलाकाई या टैरीटोरियल थी। और इसमें राष्ट्र का मकसद, बुनियादी तौर पर जनता के हितों की सेवा करना समझा जाता था न कि इसका उल्टा। लेकिन, नव-फासीवादी के साथ हम न सिर्फ यूरोपीय शैली के राष्ट्रवाद की ओर खिसक गए हैं (जिसे सबसे बढ़कर एक ‘‘अंदरूनी शत्रु’’ की निशानदेही में देखा जा सकता है) बल्कि यह बदलाव इतना भारी है कि यह कहना गलत नहीं होगा कि यह तो राष्ट्र की उस अवधारणा का ही सिर के बल खड़ा कर दिया जाना है, जो उप-निवेशवादविरोधी संघर्ष के दौरान विकसित हुई थी।
इस शीर्षासन की अवस्था में, राज्य ही है जो जनता के ऊपर प्रतिष्ठित नजर आता है, न जनता उसके ऊपर। जनता की भूमिका ‘‘राष्ट्र’’ की सेवा करने की हो जाती है, न कि राष्ट्र की भूमिका जनता की सेवा करना। जनता के अधिकारों को कमतर बनाया जाता है, जबकि उसके कर्तव्यों पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इस तरह हमारा सामना दुहरे दैवीकरण से होता है। जनता से भिन्न, ‘‘राष्ट्र’’ का दैवीकरण होता है और यह पलटकर, ‘‘नेता’’ का दैवीकरण बन जाता है। ‘‘नेता’’ की कोई भी आलोचना, तथ्यत: एक राष्ट्र विरोधी कृत्य बन जाती है!
नेता का दैवीकरण और नागरिक अधिकारों पर हमला
राष्ट्र की अवधारणा का यह सिर के बल खड़ा किया जाना इस तथ्य में अभिव्यक्त होता है कि बजाए इसके कि जनता द्वारा अपने हितों की सेवा करने के लिए ‘‘नेता’’ का चुनाव किया जाए, जनता से ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह ‘‘नेता’’ की सेवा करेगी। इसी विडंबना की चरम अभिव्यक्ति में जैसा कि हम आगे देखेंगे, अब तो ‘‘नेता’’ ही उस ‘‘जनता’’ का चुनाव करने लगा है, जिसका वह कथित रूप से नेता होगा।
राष्ट्र की अवधारणा के सिर के बल खड़ा किए जाने की यह प्रवृत्ति अनगिनत उदाहरणों के जरिए, अनगिनत तरीकों से खुद को अभिव्यक्त करती है। किसी और ने नहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर बैठे योगी आदित्यनाथ ने भारतीय सेना को ‘‘मोदी जी की सेना’’ कहकर संबोधित किया था, जो ‘‘नेता’’ द्वारा ‘‘राष्ट्र’’ की पहचान हड़प लिए जाने की हैरान करने वाली कोशिश को दिखाता है। इसी प्रकार, नागरिकों के अधिकारों पर जबर्दस्त हमला हो रहा है।
कुछ अर्सा पहले, जब वामपंथ के समर्थन से यूपीए-1 की सरकार देश में चल रही थी, उसने जनता को अधिकार देने वाले तीन अति-महत्वपूर्ण कानून बनाए थे: वन-अधिकार कानून, सूचना का अधिकार कानून और महत्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा)। इस समय इन सभी कानूनों को बेमानी बनाया जा रहा है।
हालांकि वन-अधिकार कानून कागज पर तो बना हुआ है, लेकिन उसके ऊपर वन (संरक्षण) संशोधन कानून 2023 को लाद दिया गया है, जिससे अब ‘‘ढांचागत’’ कामों के लिए (इजारेदार पूंजी द्वारा उपयोग के लिए) वन-भूमि का दिया जाना आसान हो गया है और यह ग्राम सभा के अनुमोदन बिना भी किया जा सकता है।
सूचना का अधिकार कानून में 2019 और 2023 में संशोधन कर, सूचना के अधिकार के अंतर्गत जानकारी की अर्जियों की बढ़ती संख्या के खारिज किए जाने का रास्ता बना दिया गया है।
और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को, जिसने मांग करने पर रोजगार का प्रावधान किया जाना अनिवार्य बनाने (या रोजगार न दे पाने की सूरत में काम मांगने वालों को मुआवजा दिए जाने) की व्यवस्था के जरिए, करोड़ों ग्रामीण परिवारों को जीवन रेखा मुहैया करायी थी, सीधे-सीधे निरस्त ही कर दिया गया है। इस कानून को, जिसे संसद में विस्तृत चर्चा के बाद और संसद के बाहर सार्वजनिक बुद्धिजीवी तथा मजदूरों के प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत चर्चा के बाद, संसद द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था, महज ध्वनि मत से और करीब-करीब बिना किसी चर्चा के ही, निरस्त कर दिया गया।
जहां एक ओर जनता से अधिकार छीने गये हैं, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री के नाम वाली टार्गेटेड योजनाओं की गिनती बढ़ रही है। लोगों को भारत का नागरिक होने के अधिकार से जो हासिल होना चाहिए, उसे ये योजनाएं ऐसी कृपा में तब्दील कर देती हैं, जो दयालु प्रधानमंत्री (‘‘नेता’’) द्वारा उन पर की जाती है। अधिकारों के इस तरह छीने जाने के साथ ही साथ, ‘‘कर्तव्यों’’ पर बहुत जोर दिया जाता है। प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक, सरकार के अधिकारी नागरिकों के ‘‘कर्तव्यों’’ पर जोर देते कभी नहीं थकते हैं। और अब तो राजधानी की सबसे महत्वपूर्ण सड़क को, जिस पर भारत के राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस पर परेड की सलामी लेते हैं, नाम बदलकर ‘‘कर्तव्य पथ’’ का नाम ही दे दिया गया है, ताकि लोग कर्तव्य पूरे करने की अपनी जिम्मेदारी कभी नहीं भूलें।
नेता ही चुन रहा है जनता को
फिर भी, राष्ट्र की अवधारणा के इस तरह सिर बल खड़ा किए जाने का सबसे विचित्र उदाहरण मतदाता सूचियों का विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) है, जो भारत के चुनाव आयोग द्वारा ऐसे अनेक राज्यों में कराया जा रहा है, जहां इस समय चुनाव हो रहे हैं।
आइए, पहले तो इस पर नजर डाल लें कि अब चुनाव आयोग का गठन किस तरह होता था। इससे पहले तक, मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों का चयन, एक तीन सदस्यीय कमेटी द्वारा किया जाता था, जिसमें प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के अलावा, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते थे। लेकिन, भाजपा सरकार ने बिना कोई कारण दिए, उक्त व्यवस्था को बदल डाला और नया कानून बनाकर, मुख्य न्यायाधीश की जगह पर एक मंत्री को बैठा दिया, जिसका चुनाव अपने मंत्रिमंडल में से प्रधानमंत्री करेंगे। वर्तमान में इस तीसरे स्थान पर गृह मंत्री को रखा गया है। इस तरह चुनाव आयोग की नियुक्ति करने वाली वर्तमान तीन सदस्यीय कमेटी में प्रधानमंत्री का बहुमत है और तीन में से दो वोट उनके ही पास हैं।
इस आयोग ने, अनाधिकृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाने के नाम पर, लोगों से असंभव दस्तावेज मांगने के जरिए, उनके नाम काटने शुरू कर दिए हैं। बेशक, कई दस्तावेज जिन्हें शुरूआत में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता के रूप में पात्रता के साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा था, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्य के रूप में बहाल किया है। इसके बावजूद, लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से काट दिए गए हैं।
पश्चिम बंगाल में ही, अनुमानत: 90 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं, जो कुल मतदाताओं का 11 फीसद से ज्यादा होता है। और इनमें बहुत भारी संख्या अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की है, जिन्हें इस समय नव-फासीवादी संगठनों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। बेशक, इन नामों के काटे जाने की अंतिमता में सुप्रीम कोर्ट ने जरा सा अड़ंगा लगा दिया है, जिसने नाम काटे जाने के शिकारों की शिकायतों की सुनवाई की अवधि कुछ बढ़ा दी है। लेकिन, अपने आप में स्वागत योग्य होने के बावजूद, यह नुकसान को जरा सा टालने का या उसे जरा सा कम करने का ही काम करता है, नुकसान को पूरी तरह से खत्म नहीं करता है।
इस तरह, हमारे देश में आज प्रधानमंत्री और उनके नुमाइंदे ही यह तय कर रहे हैं कि वह ‘‘जनता’’ कौन सी होगी, जो सरकार को चुनेगी। बजाए इसके कि ‘‘जनता’’ सरकार को चुने, हमारे यहां सरकार ही ‘‘जनता’’ को चुन रही है। यह सारत: राष्ट्र की अवधारणा का ही सिर के बल खड़ा किया जाना है। यह हमें बर्टोल्ड बे्रख्त की एक प्रसिद्ध कविता की याद दिलाता है: ‘लगता है कि जनता ने सरकार का विश्वास खो दिया है। क्यों न सरकार जनता को भंग कर दे और अपने लिए एक नयी जनता चुन ले!’ यहां हम ब्रेख्त की व्यंग्यात्मक सलाह का शब्दश: परिपालन होता देख रहे हैं। लेकिन यह विडंबना नव-फासीवाद के सार को पकड़ती है और उस ‘‘जनता-नेता’’ रिश्ते के सिर के बल खड़ा किए जाने को सामने लाती है, जो नव-फासीवाद राष्ट्र की अवधारणा के सिर के बल खड़ा किए जाने पूरक के रूप में सामने आता है।
नव-फ़ासीवाद के उतार का समय
फिर भी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नव-फासीवाद इस समय उतार पर है। उसे हर जगह धक्के लग रहे हैं। ट्रंप की ईरान में हार हुई है, जो उस देश पर अपने हमले के घोषित लक्ष्यों में से कोई भी हासिल नहीं कर पाया है। हंगरी में चुनाव में विक्टर ओर्बान की हार हुई है। घोर-फासीवादी नेतन्याहू तक इस्राइल में अपनी हत्यारी परियोजना के लिए समर्थन खिसकते हुए देख रहा है। और खुद मोदी को भारतीय संविधान में वह तब्दीली करने के लिए संसदीय समर्थन हासिल करने में नाकामी मिली है, जिससे लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाकर, भाजपा अपना राज कार्यकाल दर कार्यकाल बनाए रख सकती थी।
बेशक, इसका अर्थ नव-फासीवाद का अंत होना नहीं है। नव-फासीवाद तो एक खास परिस्थिति संयोग में उभर कर आया है और यह परिस्थिति संयोग है, नव-उदारवाद के संकट का। इस परिस्थिति संयोग से नव-उदारवाद के दायरे में नहीं उबरा जा सकता है। लेकिन, जब तक नव-उदारवाद को लांघने के जरिए इस परिस्थिति संयोग को ही लांघा नहीं जाता है, नव-फासीवाद को पैदा करने वाली परिस्थितियां बनी ही रहेंगी और चुनाव हराए जाने के बाद भी नव-फासीवाद लौट कर आ सकता है, जिसका सबूत ट्रंप खुद है।
फिर भी चुनाव में नव-फासीवाद का हराया जाना, न सिर्फ जनतंत्र की बहाली के लिए आवश्यक शर्त है बल्कि खुद नव-उदारवाद को लांघने के लिए भी आवश्यक शर्त है।
(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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