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व्याख्यान: किसान आंदोलन में हिंदी साहित्यकारों का योगदान

वेस्लेयन यूनिवर्सिटी में भारतीय इतिहास के प्रोफेसर विलियम आर पिंच ने किसान आंदोलन में हिंदी साहित्यकारों के योगदान पर व्याख्यान दिया।
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पटना: चिंताहरण सोशल डेवलपमेंट ट्रस्ट की ओर से चिंताहरण स्मृति व्याख्यान  का आयोजन पटना के बहुउद्देशीय सांस्कृतिक परिसर ( भारतीय नृत्य कला मंदिर ) में किया गया। व्याख्यान का विषय था " 'स्वामी सहजानंद सरस्वती के किसान आंदोलन में हिंदी के साहित्यकारों की भूमिका'। 

इस मौके पर पटना के साहित्य व सांस्कृतिक जगत के अलावा समाज के विभिन्न तबकों व जनसंगठनों के प्रतिनिधि और लोग मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन  युवा संस्कृतिकर्मी  जयप्रकाश ने किया।

स्वागत वक्तव्य देते हुए श्री सीताराम आश्रम ट्रस्ट के सचिव डॉ सत्यजीत सिंह ने कहा "आज स्वामी सहजानंद सरस्वती का असली जन्मदिन है। स्वामी सहजानंद सरस्वती ऐसे महान किसान नेता थे जिन्होंने सिर्फ अपनी मुक्ति की बात नहीं की बल्कि समाज को कैसे मुक्ति दिलाए जाए इसके बारे में सोचा। स्वामी जी ने संन्यास से समाजवाद की यात्रा रही है। "

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के सदस्य रहे चिंताहरण डॉ. (कर्नल ) ए.के.सिंह ने अपने संबोधन के दौरान बताया "मेरे बाबा ने बहुत ज्यादा उम्र में विवाह किया। जब मेरे पिता का जन्म हुआ तो उसका नाम हुआ चिंताहरण सिंह मतलब चिंता का हरण करने वाला। इस तरह सेवा करना मेरे परिवार का संस्कार रहा है। मैं बंबई छोड़ कर पटना आया। इंग्लैंड से अपने भाई सत्यजीत को प्रेरित कर पटना लाया। अपने बेटे को भी बंबई  से पटना लाएं। मैंने डॉक्टर होकर हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन  में काम किया। काम को छोड़ कर किसी भौतिक सुख के पीछे नहीं भागा।"

वेस्लेयन यूनिवर्सिटी में भारतीय इतिहास के प्रोफेसर विलियम आर.पिंच ने अपने संबोधन में कहा " स्वामी सहजानंद सरस्वती पर सबसे महत्वपूर्ण काम मेरे गुरु वाल्टर हाउज़र का था। मैंने साहित्यकारों की भूमिका के बदले योगदान पर ज्यादा ध्यान दिया। सबसे पहले वाल्टर हाउज़र ने स्वामी सहजानंद सरस्वती ने जुड़े दस्तावेजों को पचास के दशक में खोजा। फिर कुछ दस्तावेजों को अमेरिका के गए लेकिन फिर अब पटना लौटकर आ गया। जब मैं वाल्टर हाउज़र का छात्र था तब उन दस्तावेजों को  अमेरिका में ही देखने का मौका  नहीं मिला था। लेकिन अब जब पटना आया हूं, छुट्टी लेकर तब देखने का मौका मिला है। इन सामग्रियों से गुजरते हुए मोहित हूं। बहुत दिलचस्प और काम की सामग्री है। आप में से कई लोग चंपारण में एक जमाने के साहित्यकार रहे धनराज पुरी का नाम जानते होंगे,  जिनकी किसान आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका थी। अब सवाल यह है कि किसे हम साहित्यकार या लेखक मानेंगे। स्वामी सहजानंद सरस्वती खुद लेखक थे। बी.बी मिश्रा एक महत्वपूर्ण लेखक थे जो स्वामी जी की गतिविधियों की प्रेस रिलीज लिखा करते थे।  सारण और चंपारण जिले में राहुल सांकृत्यायन और नागार्जुन किसान आंदोलन में सीधे सीधे प्रत्यक्ष भागीदार थे। "

 

भारतीय इतिहास के प्रोफेसर विलियम आर पिंच, जो विजय पिंच के नाम से  भी जाने जाते हैं,  ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा  " सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह ऐसा क्या था जिसने नागार्जुन और राहुल जी को  किसान आंदोलन में सीधे भाग लेने के लिए प्रेरित किया? अमवारी में राहुल और नागार्जुन गिरफ्तार हुए थे इन बातों से  हम सभी वाकिफ हैं। स्वामी जी के संस्मरणों से किसान आंदोलन का पता उनकी मृत्यु के बाद  1952  में प्रकाशित हुआ। उन  संस्मरणों से  बहुत कुछ पता चलता है। यह भी अजीब बात है कि स्वामी सहजानंद सरस्वती ने अपनी सभी किताबें 1941, 42 में लिख ली गई थी पर उनके जीवन काल में क्यों नहीं छपी थी? उनकी मौत के कई दशकों बाद छपी। जैसा कि हमलोग जानते हैं कि 1939 तक आते-आते वे वामपंथ की ओर आकृष्ट होने लगे थे। 1939 के अक्टूबर में कार्यांनन्द शर्मा   के किसान आंदोलन के किए हुए आधार पर कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। इस स्थापना में बी.बी मिश्रा भी शामिल थे जिनका नाम आप सबों को जानना चाहिए। बी. बी मिश्रा बाद में बिहार के कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से थे। स्वतंत्र भारत में बिहार अभिलेखागार के निर्देशक रहे। जब 1941 में हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला किया तब कम्युनिस्ट पार्टी ने पीपुल्स वार की लाइन ली। 

जब स्वामी जी जेल में रहे तब उन्हें बहुत कुछ लिखने का मौका मिला। जेल में स्वामी जी के साथ बीसवीं सदी  के सबसे बेहतरीन दिमागों में से एक राहुल  सांकृत्यायन भी थे। जेल में ही स्वामी जी और राहुल जी दोनों अपनी आत्मकथा लिख रहे थे। स्वामी जी ने तिब्बत के बाद राजनीति से जुड़ने की कथा लिखी है। 'खेतमज़दूर', 'झारखंड के किसान' आदि जैसी किताबें लिखीं । यहीं उन्होंने 'गीता हृदय' का पहला ड्राफ्ट लिखा जो गीता की मार्क्सवादी व्याख्या के रूप में देखी जाती है।"

विलियम पिंच ने अमवारी में राहुल सांकृत्यायन पर हमले और गिरफ्तारी के बारे में बताया "इस बात पर बहुत बहस हुई कि क्या  पहले गिरफ्तारी  हुई और तब हमला किया ? यानी क्या पुलिस के संरक्षण में उनपर जमींदार के हाथी पर सवार उसके महावत द्वारा ?  बी.बी मिश्रा ने राहुल जी जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान के साथ जो गलत व्यवहार किया गया इस बारे में लिखा। इसकी चर्चा दुनिया भर के अखबारों में  हुई। नागार्जुन ने 1943 में  स्वामी सहजानंद सरस्वती को लिखे अपने  पत्र में लिखा है कि आप मेरे राजनीतिक गुरु थे । राहुल उनके  आध्यात्मिक गुरु के समान थे। श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म का अध्ययन करने की प्रेरणा उन्हें राहुल से ही मिली। नागार्जुन पता नहीं क्यों अपनी जीवनी के बारे में बात करने से बचते रहे  हैं। नागार्जुन ने अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखी ? पूछने पर कहा कहा करते थे कि 'मेरा काव्य पढ़ो।'

नागार्जुन पर उनके पुत्र शोभाकांत और  तारानंद वियोगी ने जीवनी लिखी है। 1938 के समर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स  के पहले  बिहार वी यूपी की सीमा पर बोलहवा गए वहां के महंत से मिलने। महंत ने नागार्जुन को लाठी से पीटने का आदेश दिया। नागार्जुन किसी तरह कुछ साधुओं की मदद से  वहां से भागे। यह 1938 के अक्टूबर की बात है। गोरखपुर के अपने परिचितों से जाकर मदद मांगी। बाद में इस महंत के बारे में पता चला कि वह बच्चों की बलि देता है, स्त्रियों के साथ व्यभिचार करता है। अंत में वह महंत जेल जाता है। नागार्जुन ने भगत सिंह के साथी रहे केदारमणि शुक्ल  के साथ कम्युनिस्ट पार्टी के युवाओं का ट्रेनिंग स्थल खोला।  सारण और चंपारण में चूंकि कांग्रेस मजबूत थी इस कारण किसान सभा को वहां घुसने में काफी परेशानी थी।  यहां 1938 में किसान सभा में बहुत विवाद था। कांग्रेस और किसान सभा में विवाद की वजह  कांग्रेस पर जमींदारी  का प्रभाव था।  वैसे विवाद के ओर नागार्जुन थे तो दूसरी ओर  महंत धनराज पुरी थी। विवाद की वजह 1937 का चुनाव था।  विवाद के कारण स्वामी जी ने कार्यानंद शर्मा को मुंगेर से भेजा। कार्यानंद शर्मा ने वहां से नागार्जुन को हटाकर कहीं और भेजने की बाद की थी। स्वामी जी ने बेलवा की जांच के लिए यात्रा की थी।  नागार्जुन ने राहुल जी की तरह पुरानी पांडुलिपियों आदि में अपना ध्यान नहीं लगाया। वे आंदोलन के लिए जमीन तलाश करने की कोशिश करते रहे। "

पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य व हिंदी के आलोचक प्रो तरुण कुमार ने अपने संबोधन में  प्रेमचंद, निराला, मैथिली शरण गुप्त का उदाहरण देते हुए कहा  " विलियम आर पिंच ने वह काम किया जो हमलोगों को करना चाहिए था। विषय के कितने आयाम हो सकते हैं इसकी ओर इशारा किया गया। राहुल जी ने जो काम किया उसके उसके लिए कई जन्म लेना पड़ता है। भारत में आश्रमों के साथ - साथ कोठों की भी बड़ी भूमिका रही है।  भारत में विद्रोही साधु, संतों आदि की बड़ी प्रमुख भूमिका रही है। किसान आंदोलन का मतलब है ग्रामीण भारत के बात करना। शिवपूजन सहाय ने 'देहाती दुनिया' जैसा उपन्यास लिखा। इस उपन्यास के भी सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं। किसान आंदोलन को फैलाने में लेखकों , साहित्यकारों की बड़ी भूमिका रही है।  मैथिली शरण गुप्त लिखित खंड किसान  काव्य 1916 में लिखा हुआ है। ऐसी मार्मिक वेदना के साथ लिखा गया है कि  कहा नहीं जा सकता। निराला ने 1924 में 'बादल राग' किसानों को केंद्रित कर लिखा। भारत में आज किसान, युवक और प्रेमी तीनों की आत्महत्या की जा रही है। लेखकों में कैसे किसान दृष्टि पैदा हुई इसे देखा जाना चाहिए। तुलसी हमेशा अपने काव्य के क्रिटिकल मोमेंट किसानी जीवन का मुहावरा लाते हैं जैसे का वर्षा जब कृषि सुखाने।  "

प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ने कहा " विलियम पिंच ने बड़ा काम किया है। बड़ा काम करने के लिए  थोड़ा पागलपन होना चाहिए। बिहार को बनाने में दिनकर, राहुल, नागार्जुन आदि ने बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है।"

श्री सीताराम आश्रम ट्रस्ट के अध्यक्ष कैलाश चंद्र झा ने कहा " शिव पूजन सहाय की उन्वास लाइब्रेरी के संरक्षण  के लिए सक्रिय था। दो ढाई साल पहले  शिवपूजन सहाय ने शाहाबाद जिला किसान सभा के लेटर हेड पर स्वामी  सहजानंद सरस्वती को पत्र लिखा था। फिर मैने देखा की जानकी वल्लभ शास्त्री और जनार्दन प्रसाद झा द्विज आदि का भी संलग्नता थी स्वामी जी के किसान आंदोलन से जुड़े थे। धनराज पुरी ने अपने लेटर हेड पर 'काव्य कुटीर' लिखा था। यह सब सामग्री बिहार स्टेट आर्काइव द्वारा डिजिटाइज किया जा रहा है। इसके बाद यह सार्वजनिक हो जायेगा। "

समारोह को अभिषेक कुमार आदि ने भी संबोधित किया। डॉ. सत्यजीत सिंह ने उपस्थित समूह को राघवपुर ( बिहटा) स्वामी श्री सीताराम आश्रम में किए जा रहे प्रगति के बारे में भी लोगों को अवगत कराया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो रंजीत सिंह ने किया।

इस मौके पर उपस्थित प्रमुख लोगों में थे प्रो नवल किशोर चौधरी,  प्राचीन भारत के इतिहासकार  ओ.पी जायसवाल, सर्वोदय शर्मा,  श्रीकांत,  पुष्पेंद्रकी,  डॉ. विनय कुमार, प्रो. मंजू शर्मा, प्रभाकर सिन्हा, कवि कुमार मुकुल, डॉ विभा सिंह,  आभा झा, सौम्या, डॉ. कविता, अनीश अंकुर, अधिवक्ता मदन प्रसाद सिंह, ज्ञानचंद्र भारद्वाज , एटक नेता अजय कुमार, रामलाला सिंह,  विनायक , प्रभाकर प्रसाद सिंह,  प्रो. उदय राज उदय, अभिषेक विद्रोही, बिनेश, अमोल, विश्वजीत कुमार, गोपाल शर्मा, समता राय, रविकिशन, मणिभूषण कुमार,  सुधाकर, निखिल, अवि आदि।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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