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तीसरी दुनिया की संप्रभुता पर साम्राज्यवाद का हमला

अब तक, जब साम्राज्यवाद के मनमाफ़िक न पड़ने वाले किसी निज़ाम को बदलने के स्वतः स्पष्ट उद्देश्य को लेकर वे कार्रवाई करते थे, तब भी साम्राज्यवादी सैन्य हस्तक्षेप के लिए आधिकारिक रूप से जो कारण बताया जाता था, उसमें किसी और बहाने को पर्दे की ओट बनाने की कोशिश की जाती थी। लेकिन, ईरान के मामले में उस तिनके की ओट को भी छोड़ दिया गया है।
IRAN Tehran
हवाई हमले के बाद ईरान के तेहरान का एक दृश्य। साभार: AL Jazeera

 

अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सभी प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए, साम्राज्यवाद अब तीसरी दुनिया के देशों की संप्रभुता की अवधारणा को ही ध्वस्त करना चाहता है। शासन परिवर्तन (रिजीम चेंज) के घोषित और स्पष्ट लक्ष्य के साथ, ईरान पर अमेरिका तथा इस्राइल के हमले से यह स्पष्ट है।

अब तक, जब साम्राज्यवाद के मनमाफिक न पड़ने वाले किसी निजाम को बदलने के स्वतः स्पष्ट उद्देश्य को लेकर वे कार्रवाई करते थे, तब भी साम्राज्यवादी सैन्य हस्तक्षेप के लिए आधिकारिक रूप से जो कारण बताया जाता था, उसमें किसी और बहाने को पर्दे की ओट बनाने की कोशिश की जाती थी। मिसाल के तौर पर इस तरह के बहाने बनाए जाते थे कि संबंधित निजाम के पास ‘‘जन-संहार के शस्त्र’’ थे या संबंधित निजाम मादक द्रव्यों के व्यापार में संलिप्त था या ऐसा ही कोई और बहाना। लेकिन, ईरान के मामले में उस तिनके की ओट को भी छोड़ दिया गया है। 

ईरान के खिलाफ बमबारी तब शुरू कर दी गयी, जब ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम पर, जो कि प्रकटत: विवाद का मुद्दा था, वार्ताएं चल ही रही थीं और जैसा कि बताया जाता है, उनमें प्रगति भी हो रही थी। इस तरह, औपनिवेशिक दौर के खत्म होने के बाद पहली बार, इस कार्रवाई के जरिए अमेरिका ने यह अधिकार हथिया लिया है कि तीसरी दुनिया में वह जब भी चाहे, शासन परिवर्तन या रिजीम चेंज करा सकता है।

यहां नुक्ता यह नहीं है कि ईरान के इस्लामी गणराज्य को, ईरानी जनता के बीच जन-समर्थन हासिल है या नहीं या यह निजाम दमनकारी है या नहीं या वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है या नहीं या यह निजाम विपक्ष को बर्दाश्त करता है या नहीं। नुक्ता यह है कि सिर्फ और सिर्फ ईरान की जनता को यह तय करने का अधिकार है कि उनके देश में कौन सा निजाम होना चाहिए या क्या वर्तमान निजाम को बदला जाना चाहिए और देश की जनता को ही इस बदलाव के लिए काम करने का अधिकार है। यह तय करना साम्राज्यवाद का काम नहीं है और उसे वैसे भी किसी दूसरे देश के मामलों में सैन्य हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। 

किसी देश की संप्रभुता इसी को कहते हैं और दूसरे विश्व युद्ध के बाद समूची तीसरी दुनिया में अपने-अपने देश में, उपनिवेशविरोधी संघर्षों के जरिए यही संप्रभुता हासिल की गयी थी। लेकिन, जो साम्राज्यवाद अब तक भांति-भांति की पिछले दरवाजे की तिकड़मों के जरिए इस संप्रभुता को कमजोर करने में लगा रहा था, उसने अब ऐसा करने के लिए खुल्लमखुल्ला सैन्य हस्तक्षेप का सहारा लेना शुरू कर दिया है। यह सीधे-सीधे राष्ट्रीय संप्रभुता पर हमला है और इसलिए यह इतिहास के एक नये ही अध्याय की शुरूआत का सूचक है। यह व्यावहारिक मानों में निरुपनिवेशीकरण (Decolonization) के पलटे जाने का रास्ता तैयार करता है।

साम्राज्य की हिम्मत, साम्राज्यवाद का संकट

इससे सीधे-सीधे दो सवाल उठते हैं। एक तो यह कि साम्राज्यवाद की ऐसा हमला करने की हिम्मत कैसे पड़ रही है? दूसरे, उसे खासतौर पर इस मुकाम पर ऐसा करने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? पहले सवाल का जवाब आसान है। सोवियत संघ के पराभव और शीत युद्ध के अंत ने उसे ऐसी हैसियत में ला दिया है, जहां उसे पहले की तरह अपने हाथ बंधे हुए महसूस नहीं होते हैं। मिसाल के तौर पर क्यूबा के मामले में, जहां के लिए भी साम्राज्यवाद शासन परिवर्तन की बात कर रहा है, आज की स्थिति की तुलना अगर 1962 के क्यूबाई मिसाइल संकट के समय से करते हैं, तो अंतर हैरान कर देता है। उस समय सोवियत संघ ने क्यूबा की ओर बढ़ रहे अपने पोतों को आदेश दे दिया था कि इस द्वीप की अमरीकी नाकेबंदी को बलपूर्वक तोड़ते हुए निकल जाएं और इस तरह उसने इससे नाभिकीय युद्ध छिड़ने तक का खतरा उठाया था। तब अमेरिका को ऐसी नौबत आने से बचने के लिए समझौता करना पड़ा था। इसका एक नतीजा यह हुआ कि उसके बाद से, क्यूबा के खिलाफ किसी प्रत्यक्ष साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की नौबत नहीं आयी थी। लेकिन, साम्राज्यवाद पर उस तरह का अंकुश अब नहीं रहा है। बेशक, इस तरह का अंकुश तो पिछले काफी समय से नहीं है, लेकिन जैसी कि मैं आगे चर्चा करूंगा, साम्राज्यवाद इस समय अपनी सबसे कमजोर स्थिति में है और यही उसे तीसरी दुनिया का दोबारा उपनिवेशीकरण (Recolonization) करने की कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है। पीछे हमने जो दूसरा सवाल रखा था, उसका यही जवाब है।

साम्राज्यवाद के वर्तमान संकट की प्रकृति को हम सही ढंग से तभी समझ सकते हैं, जब हम यह ध्यान में रखें कि इसके दो अलग-अलग घटक हैं। पहला यह कि पिछले तीन-चार दशक के दौरान विकसित देशों में राष्ट्रीय आय में मजदूरों के हिस्से और तीसरी दुनिया के देशों में राष्ट्रीय आय में मेहनतकशों के हिस्से में भारी गिरावट हुई है। और चूंकि इकाई आर्थिक अधिशेष में से उपभोग का हिस्सा, मजदूरों या मेहनतकशों की इकाई आय में से इसी हिस्से से कम होता है, यह सकल मांग के सापेक्ष अधि-उत्पादन या ओवर प्रोडक्शन की प्रवृत्ति पैदा करता है और इसलिए बेरोजगारी में बढ़ोतरी की प्रवृत्ति पैदा करता है। यह दूसरी बात है कि बेरोजगारी में इस बढ़ोतरी को आवरणों के पीछे छुपाया जा सकता है, जैसे अमेरिका में इसे श्रम भागीदारी की दर में गिरावट की ओट में छिपाया जा रहा है। इसका अर्थ है, मेहनतकश जनता की बदहाली में भारी बढ़ोतरी।

अमेरिका का व्यापार घाटा: साम्राज्यवाद की कमज़ोरी

साम्राज्यवाद के वर्तमान संकट में योग दे रहा दूसरा कारक यह है कि वह जब अपने शिखर पर था तब के यानी पहले विश्व युद्ध से पहले के दौर के विपरीत, आज की साम्राज्यवाद की नेतृत्वकारी शक्ति के पास इसकी सामर्थ्य ही नहीं है कि एक औपनिवेशिक साम्राज्य पर अधिशेष की निकासी या ड्रेन ऑफ सरप्लस या निरुद्योगीकरण थोपने के जरिए, अपने भुगतान संतुलन घाटे की भरपाई कर सके। याद रहे कि नेतृत्वकारी साम्राज्यवादी देश को अपरिहार्य रूप से भुगतान संतुलन घाटा उठाना पड़ता है। और वर्तमान मामले में अमेरिका के घाटे का एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि वह अपने वैश्विक प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए, दुनिया के 80 से ज्यादा देशों में, 750 से ज्यादा सैनिक अड्डों की शृंखला को चला रहा है। पहले विश्व युद्ध से पहले के दौर में, तब की नेतृत्वकारी साम्राज्यवादी ताकत, ब्रिटेन द्वारा इस भुगतान संतुलन घाटे की भरपाई, अपने उपनिवेशों की कीमत पर की जाती थी। लेकिन, चूंकि आज की नेतृत्वकारी साम्राज्यवादी ताकत, अमेरिका के पास उस तरह अपना कोई औपनिवेशिक साम्राज्य है ही नहीं, इसका नतीजा यह हुआ है कि वह डॉलर छाप-छाप कर अपने भुगतान संतुलन घाटे की भरपाई करता रहा है। इसका नतीजा यह है कि अमेरिका आज दुनिया का अब तक का सबसे ज्यादा कर्जदार देश बन गया है और दुनिया डालरों से या अमेरिका की देनदारी की सूचक, डॉलर मूल्यांकित परिसंपत्तियों से पटी पड़ी है। इससे, पूंजीवादी विश्व वित्तीय व्यवस्था की स्थिरता के लिए भारी खतरा पैदा हो गया है।

अक्सर यह इशारा किया जाता है कि जितना प्रयोग डालर का होता है, उतना और किसी भी मुद्रा का नहीं होता है और डालर के सामने कोई वास्तविक चुनौती ही नहीं है। लेकिन, यह धारणा भ्रामक है। भले ही डालर को किसी दूसरी मुद्रा से चुनौती नहीं मिल रही हो, अचानक डालर को छोड़कर, मालों के रूप में संपदा रखे जाने की संभावना हमेशा बनी रहती है और ऐसा भले ही कुछ ही समय के लिए हो तब भी, इससे पूंजीवादी दुनिया में भारी मंदी पैदा हो सकती है। 1970 के दशक के आरंभ में ठीक ऐसा ही हुआ था और यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें थैचरवाद तथा रीगनी अर्थशास्त्र या रीगनोमिक्स का उदय हुआ था, जिन्होंने मुद्रास्फीति की काट करने के लिए अपने-अपने देशों में भारी बेरोजगारी पैदा की थी। लेकिन, तब मजदूरों पर यह बोझ ऐसे हालात में थोपा जा रहा था, जब उससे पहले मजदूरों ने एक उल्लेखनीय युद्धोत्तर उछाल देखा था। लेकिन, वर्तमान हालात में वैसी स्थितियों का कोई भी दोहराव, चूंकि मजदूरों की भारी बदहाली के ऊपर से आ रहा होगा, जिसके कारणों का हम पीछे जिक्र कर आए हैं, इससे पूंजीवादी व्यवस्था की सामाजिक स्थिरता ही बुरी तरह से उलट-पुलट हो सकती है।

वर्तमान संकट पर साम्राज्यवाद  का प्रत्युत्तर

इस परिस्थिति संयोग में, इस तरह के खतरे को रोकने के लिए, साम्राज्यवाद के प्रत्युत्तर के दो घटक हैं। पहला, अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के रूप में (और अन्यत्र ऐसे ही निजाम या ऐसे ही बन सकने वाले निजामों के रूप में) नव-फासीवादी निजामों का कायम किया जाना। दूसरा है, अपने आज्ञापालक निजाम कायम करने के जरिए, दुनिया भर में औपनिवेशिक शैली का प्रभुत्व कायम करने की कोशिश करना। वेनेजुएला के निकोलस मादुरो का आपराधिक अपहरण और ईरान पर हमला, जहां पहलवी वंश की औलाद, अमेरिका की कृपा से सत्ता संभालने के लिए तैयार बैठी है, इसी तरह के पुनरुपनिवेशीकरण के उदाहरण हैं। वेनेजुएला और ईरान, दोनों तेल धनी देश हैं और वेनेजुएला में तो तेल के दुनिया के सबसे बड़े संचित भंडार हैं। उनके तेल भंडारों पर अमरीकी कंपनियों का कब्जा, अधिशेष के बहिप्रवाह या ड्रेन ऑफ  सरप्लस के एक और चक्र का रास्ता खोलेगा। इस बार यह प्रवाह अमेरिका की ओर हो रहा होगा, जो अमेरिका की भुगतान संतुलन की समस्याओं को कम करने का काम करेगा।

बहरहाल, यह पुनरुपनिवेशीकरण सिर्फ तेल धनी देशों से इस तरह की लूट या ड्रेन तक ही सीमित नहीं है। यह भारत-अमेरिका व्यापार संधि जैसी असमानतापूर्ण संधियां थोपने की कोशिश का भी रूप लेता है, जो संधियां अमरीकी मालों के लिए बंधुआ बाजार जुटाएंगी, जैसा कि औपनिवेशिक दौर में हुआ करता था। बेशक, यह तो एक अलग ही सवाल है कि क्या साम्राज्यवाद पुनरुपनिवेशीकरण की इस तरह की कोशिशों से अपने वर्तमान संकट से उबरने में कामयाब हो जाएगा? साम्राज्यवाद मानता है कि पुनरुपनिवेशीकरण, इस संकट से उबरने का एक रास्ता है और यही है जिससे फर्क पड़ता है।

पुनरुपनिवेशीकरण (Recolonization) की सामराजी मुहिम की ओर

अभी पिछले ही दिनों अमरीकी विदेश सचिव (मंत्री) मार्को रूबियो ने, यूरोप के नेताओं के एक समूह के सामने, जो इस संबंध में शुरूआत में संशयशील थे, सामराजी रणनीति के तौर पर पुनरुपनिवेशीकरण का प्रस्ताव किया था। बेशक, उनकी भाषा जरा अलग थी, लेकिन उनका सुझाव जितना प्रत्यक्ष हो सकता था, उतना प्रत्यक्ष था। उनकी दलील थी कि शानदार ‘‘पश्चिमी सभ्यता’’ को  पिछले कई वर्षों में, कम्युनिज्म के उभार के चलते और कम्युनिज्म द्वारा समर्थित उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों के चलते, एक धक्का लगा था। इस धक्के को पलटने की जरूरत है। जाहिर है कि इसका अर्थ है, उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों की उपलब्धियों को पलटना यानी दुनिया का पुनरुपनिवेशीकरण करना। संक्षेप में रूबियो के अनुसार ‘पश्चिमी सभ्यता’ के गौरव की बहाली, दुनिया के पुनरुपनिवेशीकरण पर निर्भर है। तीसरी दुनिया को साम्राज्यवादी नियंत्रण के आधीन बनाने के इससे ज्यादा सीधे आह्वान की तो कल्पना भी करना मुश्किल है।

खबरें बताती हैं कि रूबियो की दलील, शुरूआत में संशयशील रहे यूरोपीय नेताओं के लिए कायल करने वाली साबित हुई। हैरानी की बात नहीं है कि ईरान पर ढहाए गए ताजातरीन अमरीकी-इज़रायली जुल्म का, स्पेन को छोडक़र, यूरोप से कोई बड़ा विरोध नहीं हुआ है। इसलिए, ऐसा लगता है कि हम, निरुपनिवेशीकरण की उपलब्धियों को पलटने के लिए, तमाम साम्राज्यवादी देशों की सुसंगठित मुहिम को देखने की कगार पर हैं। 

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित यह आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें–

Imperialism’s Attack on Third World Sovereignty

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