ट्रेड यूनियनों पर सीजेआई की टिप्पणी से उठा बड़ा विवाद
नई दिल्ली: घरेलू कामगारों के अधिकारों से जुड़ी एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत द्वारा की गई टिप्पणियों ने देशभर में तीखी बहस और विरोध को जन्म दे दिया है। ट्रेड यूनियनों और वामपंथी दलों ने इन टिप्पणियों को मज़दूर-विरोधी, असंवैधानिक और नवउदारवादी आर्थिक सोच से प्रेरित बताया है।
LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई ने कहा कि देश में औद्योगिक विकास की रफ्तार धीमी होने के लिए ट्रेड यूनियनें और उनके नेता “काफी हद तक जिम्मेदार” हैं। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि न्यूनतम मज़दूरी तय करने, विशेषकर घरेलू कामगारों के मामले में, हायरिंग में रुकावट आ सकती है और इससे रोजगार सृजन प्रभावित हो सकता है।
ये टिप्पणियाँ 29 जनवरी 2026 को Thozhilalargal Sangam बनाम भारत संघ (डब्ल्यूपी (सी) संख्या 42/2026) मामले की सुनवाई के दौरान की गईं, जिसमें घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी उपायों की मांग की गई थी।
सीजेआई ने क्या कहा
LiveLaw के अनुसार, सुनवाई के दौरान सीजेआई ने सवाल उठाया कि क्या ट्रेड यूनियनों की गतिविधियाँ और श्रम कानूनों का कड़ाई से पालन औद्योगिक विस्तार और निवेश को हतोत्साहित नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि यूनियनें अक्सर सुधारों का विरोध करती हैं, जिससे उद्योगों का विकास रुकता है।
घरेलू कामगारों के संदर्भ में, अदालत ने यह चिंता जताई कि यदि न्यूनतम मज़दूरी अनिवार्य की जाती है तो इससे मध्यवर्गीय परिवारों पर बोझ बढ़ेगा और घरेलू कामगारों की मांग घट सकती है।
हालाँकि इन टिप्पणियों को आर्थिक दृष्टिकोण से रखा गया, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे औद्योगिक संकट का दोष सीधे संगठित मज़दूर आंदोलन पर डाल दिया गया।
ट्रेड यूनियनों की तीखी प्रतिक्रिया
देश के प्रमुख मज़दूर संगठन, सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (CITU) ने सीजेआई की टिप्पणी को “दुर्भाग्यपूर्ण, असंवैधानिक और तथ्यहीन” बताया।
CITU ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के शब्द उन नवउदारवादी नीतियों के पैरोकारों जैसे लगते हैं, जो पहले ही देश-दुनिया में विफल साबित हो चुकी हैं। संगठन के अनुसार, संगठित और संरक्षित श्रम न केवल उत्पादनशीलता बढ़ाता है, बल्कि औद्योगिक स्थिरता और सतत विकास में भी योगदान देता है।
CITU ने कहा,“यह दावा कि ट्रेड यूनियनें औद्योगिक विकास में बाधा हैं, न तो सैद्धांतिक रूप से सही है और न ही आंकड़ों से इसकी पुष्टि होती है।”
संविधान और मौलिक अधिकारों पर सवाल
मज़दूर संगठनों का कहना है कि सीजेआई की टिप्पणी सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) में दिए गए संगठन बनाने के मौलिक अधिकार को कमजोर करती है।
भारत में ट्रेड यूनियनों का पंजीकरण और उनकी गतिविधियाँ ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के तहत संरक्षित हैं, जो सामूहिक सौदेबाज़ी और श्रमिक हितों की रक्षा की कानूनी गारंटी देता है।
CITU ने चेतावनी दी कि जब संविधान के संरक्षक माने जाने वाले पद से ऐसी टिप्पणियाँ आती हैं, तो इससे न केवल मज़दूर अधिकारों को ठेस पहुँचती है, बल्कि सरकारों और नियोक्ताओं को श्रम कानूनों को और कमजोर करने का नैतिक आधार भी मिल जाता है।
समय को लेकर भी सवाल
इस विवाद को और गंभीर बना दिया है इसके समय ने। सीजेआई की टिप्पणी ऐसे वक्त आई है जब 12 फरवरी 2026 को देशव्यापी आम हड़ताल होने जा रही है। यह हड़ताल चार नए श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) के खिलाफ लगभग सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा बुलाई गई है।
CITU का कहना है कि लेबर कोड्स और सीजेआई की टिप्पणी—दोनों एक ही सोच को दर्शाते हैं, जिसमें श्रमिक अधिकारों को “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” के नाम पर बाधा माना जा रहा है।
क्या आँकड़े सीजेआई के दावे का समर्थन करते हैं?
ट्रेड यूनियनों ने सीजेआई के दावे को खारिज करते हुए सरकारी आंकड़ों का हवाला दिया।
श्रम ब्यूरो की औद्योगिक विवाद, तालाबंदी, छँटनी और ले-ऑफ संबंधी रिपोर्टों के अनुसार:
• 2006 में देश में 430 औद्योगिक विवाद दर्ज हुए, जो सबसे अधिक थे।
• 2006 से 2014 के बीच औसतन 354 विवाद प्रति वर्ष थे।
• 2015 से 2023 के बीच यह औसत घटकर मात्र 76 रह गया।
• 2018 के बाद से हर साल औद्योगिक विवाद 100 से कम रहे हैं।
• सितंबर 2023 तक पूरे देश में केवल 30 औद्योगिक विवाद दर्ज किए गए, जो 17 साल का न्यूनतम स्तर है।
CITU का कहना है कि जब औद्योगिक विवाद ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर हैं, तो यूनियनों को औद्योगिक पतन का जिम्मेदार ठहराना सरासर गलत है।
उद्योग बंद होने के असली कारण
CITU ने संसद में पेश सरकारी आंकड़ों का भी हवाला दिया, जिनके अनुसार पिछले पाँच वर्षों में 2,04,268 निजी कंपनियां बंद हुईं। ये बंदियां विलय, परिसमापन, रूपांतरण या कंपनियों अधिनियम, 2013 के तहत नाम हटाए जाने के कारण हुईं—न कि मज़दूर आंदोलनों के कारण।
इसके अलावा, दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के आंकड़े दिखाते हैं कि बड़े औद्योगिक संकट का कारण कॉरपोरेट विफलता, वित्तीयकरण और बैंकिंग संकट हैं।
घरेलू कामगार और न्यूनतम मज़दूरी
सीजेआई की घरेलू कामगारों पर टिप्पणी को लेकर भी तीखी आलोचना हुई है। CITU ने कहा कि कई राज्यों में घरेलू कामगारों के लिए पहले से ही न्यूनतम मज़दूरी तय है और इससे रोजगार खत्म नहीं हुआ है।
मज़दूर संगठनों का कहना है कि न्यूनतम मज़दूरी से इनकार करना, खासकर महिलाओं पर आधारित इस क्षेत्र में, शोषण को वैध ठहराने जैसा है।
वामपंथी दलों की प्रतिक्रिया
भाकपा-माले (लिबरेशन) ने भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को ग़लत बताया।पार्टी ने कहा कि यह बयान मज़दूर वर्ग के ऐतिहासिक संघर्षों और बलिदानों को नकारने की कोशिश है।
पार्टी के अनुसार, आठ घंटे का कार्यदिवस, न्यूनतम मज़दूरी, सामाजिक सुरक्षा ये सभी अधिकार ट्रेड यूनियनों के लंबे संघर्षों से हासिल हुए हैं, न कि किसी संस्था की कृपा से।
व्यापक राजनीतिक निहितार्थ
विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद केवल एक टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि किस तरह संस्थागत सोच धीरे-धीरे बाज़ार-केंद्रित विचारधारा की ओर झुक रही है।
मज़दूर संगठनों के लिए यह चिंता का विषय है कि अब उनके अधिकारों को न केवल सरकार, बल्कि संवैधानिक संस्थानों से भी चुनौती मिल रही है।
पुनर्विचार की मांग
CITU ने सीजेआई से अपील की है कि वे अपनी टिप्पणी पर पुनर्विचार करें और उसे वापस लें। जैसे-जैसे देश 12 फरवरी की आम हड़ताल की ओर बढ़ रहा है, यह विवाद साफ संकेत देता है कि श्रम अधिकारों की लड़ाई अब केवल सड़कों या संसद तक सीमित नहीं रही बल्कि संविधान की व्याख्या के स्तर तक पहुँच चुकी है।
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