ILDC कॉन्फ्रेंस: चुनौतियों के बीच अपनी ‘ज़मीन’ तलाशती महिलाएं
भारत में बीते कुछ सालों से इंडिया लैंड एण्ड डेवलॉपमेंट कॉन्फ्रेंस (ILDC) का आयोजन किया जा रहा है। ILDC एक ऐसा अंतराष्ट्रीय मंच है, जो भूमि शासन, नीति और विकास से जुड़े मुद्दों पर संवाद के लिए हितधारकों को एक मंच पर लाता है। इनमें सरकारी निकाय, नागरिक संगठन, ज़मीनी कार्यकर्ता शामिल होते हैं।
बीते वर्ष 2025 में हुई 9वीं कॉन्फ्रेंस को 23 देशों के 492 प्रतिभागियों के साथ गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित किया गया।
18 से 20 नवंबर के बीच अहमदाबाद मैनेजमेंट एसोसिएशन (AMA) में सम्पन्न हुयी इस कॉन्फ्रेंस में मुख्य और प्रबंधकीय भूमिका ‘लैंडस्टैक’ संस्था की रही।

इस बार कॉन्फ्रेंस का विषय ‘सतत विकास में भूमि की केन्द्रीय भूमिका: अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी चुनौतियों का समाधान’ था।
कॉन्फ्रेंस के विभिन्न सत्रों में से 6 सत्र 18 नवंबर को पहले दिन ‘होल्डिंग अवर ग्राउन्ड: वुमन लैंड एण्ड लाइफ, विषय पर आयोजित किये गए। इन सत्रों के संवाद में डॉ मधुबेन कोरडिया, शिवानी गुप्ता, डॉ चारु जैन, इब्राना नाज़, सीमा गौतम जैसी विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
मधुबेन कोरडिया गुजरात से आती हैं। वे महिलाओं के भू-अधिकारों सहित अन्य अधिकारों पर कार्य करती हैं। इस संवाद में वह कहती हैं कि, ‘ज़मीन का अर्थ महिलाओं के लिए उनकी आर्थिक शक्ति का प्रमुख आधार है। मगर, चिंतनीय है कि, गुजरात में महिलाओं के लिए ज़मीन का कोई विशेष अधिकार नहीं है। यदि परिवार में ज़मीन है तो वह पुरुषों के नाम है। गुजरात में महिलाओं को ज़मीन मिलने से कृषि, पशुपालन, औषधि पैदा करने जैसे रोजगार मिलेंगे।
मधुबेन आगे एक उदाहरण देते हुए बतलाती हैं कि, एक बार तीन महिलाओं को मायके के परिवार से ज़मीन मांगने पर उत्तर मिला कि हम ज़मीन नहीं देंगे, उसके बदले सभी बहनों को तीन-तीन लाख रुपये देंगे, लेकिन उसके बाद सारे रिश्ते ख़त्म हो जाएंगे।
वह कहती हैं कि, ‘हमें सोचना होगा कि ऐसे मामलों से कैसे निपटा जाए, ताकि महिलाओं को भू-अधिकार मिले।’
इस संवाद में उत्तर प्रदेश से आने वाली सीमा गौतम की भी भागीदारी रही। वे अपनी चर्चा में कहती हैं कि, ‘महिलाओं के लिए ज़मीन का सवाल साहूजी महराज, महात्मा ज्योतिबा फुले, बाबा साहब डॉ. अंबेडकर जैसे महपुरुषों के आंदोलनों का हिस्सा रहा है। इन्हीं महापुरुषों की राह पर हमने ज़मीन के लिए संघर्ष शुरू किया तो लोगों ने कहा कि, ‘कहाँ है ज़मीन? ज़मीन कहाँ से लाओगे? तब हमारा जवाब था कि, सरकारी परियोजनाओं के लिए ज़मीन जहां से आती है, वहीं से महिलाओं को ज़मीन मिले।’
आगे सीमा बयां करतीं हैं कि, ‘भारतीय समाज में ज़मीन वह साधन है जिस पर लोग पीढ़ियों से भुखमरी खत्म कर पेट पालते हैं। मजबूती और सम्मान से जीते हैं। जमींदारों का शिकार नहीं होना पड़ता। मगर, आज भी देश के मुठ्टीभर जमींदारों और कॉरपोरेट घरानों के पास हजारों एकड़ ज़मीन है। जबकि, देश के 57 प्रतिशत दलित भूमि हीन हैं।,
सीमा बतलाती हैं कि, उन्होंने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में करीब 450 गाँव में ज़मीन अधिकार के मुद्दे पर महिलाओं और परिवारों को जागरूक व एकजुट किया। जब ज़मीन के लिए आंदोलन के जरिए सरकार तक हमने आवाज पहुचाई, तब हमारे ऊपर विदेशी फंडिंग का आरोप लगाकर छापामारी की गयी। 28 लोगों पर एफआईआर दर्ज कर 12 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
सीमा कहती हैं कि, ‘गंभीर चुनौतियों के बाद हमने यूपी सरकार से यह कहते हुए मांग की कि, तेलंगाना सरकार जब 2014 से कार्य शुरू कर 2022 तक परिवारों को 3-3 एकड़ ज़मीन दे सकती है, तब अन्य राज्यों की सरकारें क्यों ज़मीन नहीं दे सकती? तब सरकार ने करीब 800 परिवारों को ज़मीन देने का आदेश दे दिया है। यह हमारे संघर्ष का नतीजा है।

ट्रांस समुदाय के संपत्ति अधिकार पर कार्यरत महाराष्ट्र की दामिनी रागाड़े अपने विचार रखते हुए कहती हैं कि, ‘परिवार एक ट्रांस को खून का रिश्ता होने के बाद भी अपनाने के बजाय बेघर कर देता है। तब ट्रांस की पहचान, संपत्ति, रिश्ते खत्म होने के करण उन्हें सरकारी दस्तावेज बनवाने, लोन लेने जैसे कई कार्यों में रुकावट आ जाती है। वहीं, ट्रांस लोगों को एक समूह में गुरु-शिष्य परंपरा की संस्कृति के बीच रहना पड़ता है। जिसमें एक गुरु के 5 से 10 शिष्य होते हैं। पर, गुरु के स्वर्गवास के बाद उनकी संपत्ति केवल एक और प्रिय शिष्य को मिलती है। जिससे अन्य शिष्यों में संपत्ति अधिकार की लड़ाई खड़ी हो जाती है।
दामिनी बताती हैं कि ‘एक ट्रांस के निधन पर अंतिम संस्कार के लिए भी कोई ज़मीन नहीं मिलती। तब लड़ना पड़ता है। समाज आज भी इंसान के तौर पर महिला और पुरुष को ही समझता है ट्रांस को नहीं। इसलिए ट्रांस वर्ग को भूमि, संपत्ति अन्य अधिकार हासिल करने में चुनौतियाँ आ रही हैं।
बिहार के पटना से इस कार्यक्रम में शामिल हुई इब्राना नाज़ भी मुस्लिम महिलाओं के प्रॉपर्टी राइट पर अपनी बात रखती हैं। वे कहती हैं कि, ‘उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के प्रॉपर्टी राइट में दो विचारों को पाया। पहला महिलाएं कहती हैं कि, शादी में मिला पैसा और सामान तय है कि हमें संपत्ति में अधिकार नहीं मिलेगा। दूसरा महिलाओं का मानना है कि संपत्ति में हक हमें भाइयों की अपेक्षा कम मिलता है।,
इब्राना कहती हैं कि उन्होंने संपत्ति के अधिकार को तब समझा जब पिता के स्वर्गवास के बाद उन्होंने और उनकी माँ ने संपत्ति का अधिकार दादाजी से मांगा और उन्होंने मना करते हुए विवाद खड़ा कर दिया। संपत्ति के अधिकार में कई रुकावटे हैं। जैसे मुस्लिम समुदाय में निकाह पर पति पत्नी को मेहर (एक राशि या संपत्ति) बहुत कम या अधिक-अधिक से मेहर 51 हज़ार रुपए तक देता है। जबकि, मेहर के बजाय लड़की को प्रॉपर्टी में अधिकार देने के लिए सरकार को मुस्लिम निकाह को कानूनी तौर पर रजिस्टर करना चाहिए।
डॉ. चारु जैन रिसर्च करती हैं। वे इस संवाद में अपनी एक रिसर्च को रखते हुए जाहिर करती हैं कि, ‘हमने देश के 12 स्टेट के 12 हज़ार डिजिटल लैंड रिकॉर्ड्स को देखा। महिलाओं के पास ज़मीन की साझेदारी है लेकिन उनकी कृषि व व्यक्तिगत भूमि की स्थिति का रिकार्ड हमें प्राप्त नहीं हुआ। बल्कि पता चला कि महिलाओं का ज़मीन अधिकार उनके पति या परिवार के साथ जुड़ा है।
डॉ. चारु कहती हैं कि ‘आज शिक्षित होने बाद भी महिलायें मारपीट जैसी घरेलू हिंसा के कारण भी संपत्ति अधिकार नहीं मांगती। उनके संपत्ति अधिकार के लिए बच्चे, पति व परिजन एक साथ खड़े हों, ऐसी सामाजिक संस्कृति बनानी होगी।,
इस संवाद में 20 वर्षों से सिंगल महिलाओं के अधिकारों पर कार्य करती डॉ. सुशीला प्रजापति ने भी अपना वक्तव्य रखा। जिसमें उन्होंने कहा कि, ‘महिलाओं के भूमि अधिकारों में वर्किंग ग्रुप फॉर वुमन एण्ड लैंड आनर्शिप (WGWLO) नेटवर्क गुजरात के 17 जिलों में 45 संगठनों के साथ सक्रिय है। WGWLO के प्रयासों से अब तक करीब 16000 महिलाओं को ज़मीन में अधिकार मिल चुके हैं।
वे बताती हैं कि, ‘एक्शन एड संस्था वर्ष 2001 से गुजरात में कार्यरत है। तभी से हम एकारी शक्ति मंच की शुरुआत कर गुजरात के 10 जिलों में 10000 सदस्यों के साथ संपत्ति, ज़मीन, आवास व सिंगल महिलाओं के अधिकारों पर कार्य कर रहें हैं।
इस अवसर पर झारखंड से जुड़ाव रखने वाली सुहागिनी तउडू ने कहा कि, ‘हमने 4 पंचायतों की स्टडी में पाया कि, 97 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर ज़मीन नहीं है। जिनमें 85 प्रतिशत प्रभावित महिलाएँ आदिवासी हैं। वहीं, झारखंड में महिला द्वारा अपना ज़मीन अधिकार मांगने पर उसे ‘डायन’ घोषित कर दिया जाता है। जबकि, मीडिया विश्लेषण बताता है कि, हर महीने औसतन 5 से अधिक ज़मीन से जुड़े अपराध होते हैं, जिनमें डायन हिंसा प्रमुख है।
वे बताती हैं कि ‘महिलाओं के ज़मीन अधिकार में हत्या की घटनाएं ज्यादातर सिंगल, विधवा या बुजुर्ग महिलाएँ के साथ होती हैं। ऐसे में मीडिया, पुलिस और प्रशासन को अधिक संवेदनशील होकर लैंड लॉ की जागरूकता फैलानी चाहिए।
महाराष्ट्र से इस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुईं रुकमणि नागापुरे ने भी अपना नजरिया रखा। वे बताती हैं कि ‘हमने वर्ष 2014-15 के एक सर्वे में पाया कि, 1800 से ज्यादा एकल महिलाओं की संपत्ति के अधिकार मामले में बड़ी दयनीय स्थिति थी।
वे यह भी कहती हैं कि, ‘आज महाराष्ट्र में 20 हज़ार महिलाएँ 11 जिलों के 500 गांवों में अपने संपत्ति जैसे अन्य अधिकारों के लिए संगठित हैं। फिर भी हमने देखा है कि, महिलाओं की मेहनत का एक बड़ा हिस्सा पुरुषों को जा रहा हैं।
राजस्थान की बड़की बाई 30 वर्षों भू-अधिकार संघर्ष कर रही हैं। उन्होंने इस संवाद का हिस्सा बनकर बताया कि, ‘हमने सरकारी विरोध के बाद भी महिलाओं का समूह बनाकर भूमि के लिए जयपुर से लेकर दिल्ली तक धरने किए। तब जाकर 2022 तक हम बहुत सी महिलाओं को वन अधिकार पत्र दिलवा पाए।
वे जिक्र करती हैं कि उन्होंने 2005 में वन अधिकार कानून बनने में भी योगदान दिया। वहीं, एकल महिलाओं की मदद के साथ वह समाज सुधार संघ बनाकर डायन-बांझ जैसी चुनौतियों से लड़ रही हैं।
सुकमती बघेल छत्तीसगढ़ से हैं। वे महिला अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। वे बताती है कि ‘छत्तीसगढ़ में जहां नक्सलवाद के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता हैं, वहाँ हमने महिलाओं को घर से निकाला। एकजुट किया। नेतृत्व विकसित किया और ग्राम सभा में भागीदारी बढ़ाकर वन अधिकार पट्टों में महिलाओं का प्रतिशत 10% से 50% तक बढ़ाने की नीव रखी है।’
अपनी चुनौतियों पर वे कहती हैं कि आज ज़मीन न मिलने और खनिज उत्खनन से भूमि हानि की चुनौतियां हमारे सामने आ रहीं हैं। जिनका हम डट कर मुकाबला कर रहे हैं।
वनिता बेन गावित गुजरात से आती हैं। वे एक आदिवासी, युवा विधवा महिला हैं। अपना दर्द रखते हुए वे कहती हैं कि, ‘मेरे पति के निधन के बाद मेरे ससुराल वाले कहते हैं कि, बेटे के 18 वर्ष पूर्ण होने पर उसे ज़मीन देंगे तुम्हें ज़मीन नहीं दे सकते। मैं प्रशासन से मदद मांगती हूँ तब रिश्वत मांगी जाती है। अपना अधिकार कैसे हासिल करूँ समझ नहीं आ रहा।’
आगे वनिताबेन बतलाती हैं कि, ‘मुझ जैसी एकल महिलाओं को दूसरे के खेतों में काम करने पर यौन, मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न झेलना पड़ता है। जबकि, परिवार हमारी सहायता के बजाए संपत्ति पर कब्जा करना चाहता है। उन्होंने सुझाव दिया कि विधवा महिला को संपत्ति का अधिकार दिलाने की जिम्मेदारी पंचायत की होनी चाहिए।
गुजरात में महिलाओं के लिए भूमि की आवाज उठाने वाली रेखा डोनाशिया ने कहा कि, ‘गुजरात के करीब 18500 गाँव में कई गाँव ऐसे हैं जहां मृत व्यक्ति को दफनाने के लिए 3 फुट ज़मीन मिलना मुश्किल है। रास्ते बनाने से लेकर कचरा डालने तक के लिए ज़मीन की लड़ाई है। इस लड़ाई में हत्याएं भी होती हैं। हाल में आनंद जिले के बुलाना गाँव में 4 दलितों को ज़मीन के लिए मार दिया। वहीं, ज़मीन के लिए 2 वर्ष पहले सुरेन्द्र नगर जिले में 2 दलितों की हत्या की गयी थी।
वे कहती हैं कि, ‘अहमदाबाद के धोलका तहसील के गोंठा गाँव में सरकारी पट्टे वाली महिलाओं की 250 बीघा ज़मीन दबंग लोगों कब्जा रखी थी। तब हमने 50 महिलाओं को संगठित कर आंदोलन के रूप में आवाज उठाई। पर आरोपियों ने मामला कोर्ट में पहुंचा दिया। फिर, कोर्ट ने महिलाओं को ज़मीन सौपने का फैसला दिया। आज महिलाओं अपनी ज़मीन पर खेती कर खुश हैं।,
महाराष्ट्र से आईं कुमारी बाई ने कहा कि, ‘हमने 1996 से वन अधिकार के मुद्दे पर PESA और FRA कानूनों का अध्ययन कर ग्राम सभा को वानाधिकार पट्टे के लिए मजबूत किया है। वहीं, वनाधिकार पट्टे पाने के लिए हमने महाराष्ट्र से दिल्ली तक के संघर्ष किया। तब 223 महिलाओं को व्यक्तिगत वनभूमि पट्टे मिल पाए। हमारा निरंतर भूमि अधिकार के मुद्दे पर कार्य कर रहे हैं।
ILDC के कॉन्फ्रेंस में ‘होल्डिंग अवर ग्राउन्ड: वुमन लैंड एण्ड लाइफ, विषय पर आधारित विभिन्न सत्रों में वक्ताओं के विचारों व कार्यों से संघर्ष और सफलता का रास्ता समझा जा सकता हैं। वहीं, इन सत्रों में पेश की गईं चुनौतियाँ, अनुभव और घटनाओं से देश में ज़मीन व संपत्ति की लड़ाई को आँका जा सकता है। साथ में इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया जा सकता है कि, संगठन और कार्यकर्ता कैसे महिलाओं के ज़मीन व संपत्ति के अधिकार को नई राह दे रहे हैं। ताकि, आना वाला वक्त महिला संपत्ति के अधिकार को मजबूत आधार प्रदान करे।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।
