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दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नहीं मिली किताबें: सड़क से कोर्ट तक उठा मुद्दा

एक ओर भारत की जनवादी नौजवान सभा (DYFI) ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के यमुना विहार इलाके में स्कूलों का दौरा कर शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के ख़िलाफ़ जोरदार विरोध दर्ज किया, वहीं दूसरी ओर दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में सरकार से जवाब तलब करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
DELHI

नई दिल्लीराजधानी दिल्ली में सरकारी स्कूलों के छात्रों को समय पर पाठ्यपुस्तकें न मिलने का मुद्दा अब सड़कों से लेकर अदालत तक गूंज रहा है। एक ओर भारत की जनवादी नौजवान सभा (DYFI) ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के यमुना विहार इलाके में स्कूलों का दौरा कर शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज किया, वहीं दूसरी ओर दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में सरकार से जवाब तलब करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं।

स्कूलों की हकीकत: “बच्चों को नहीं मिल रहीं किताबें”

DYFI की उत्तर-पूर्वी दिल्ली कमेटी ने 30 अप्रैल को यमुना विहार के कई सरकारी स्कूलों का दौरा किया। दौरे में सामने आया कि नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 को शुरू हुए एक महीना बीत चुका है, लेकिन कक्षा 1 से 8 तक के हजारों छात्रों को अब तक किताबें नहीं मिली हैं।

DYFI नेताओं जिला अध्यक्ष मुनाजिर आलम, जिला सचिव राजीव तिवारी, उपाध्यक्ष शाहीन और अर्शी ने छात्रों से बातचीत के दौरान पाया कि खासकर कक्षा 6, 7 और 8 के छात्रों के पास एक भी किताब नहीं है।

छात्रों और अभिभावकों ने बताया कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार बाजार से महंगी किताबें खरीदने में सक्षम नहीं हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। वानिया, मेघा, अंजलि, ज़िक्रा, ज़ुनेरा और अफशा जैसे छात्रों ने बताया कि 10 मई से गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं, लेकिन उनके पास न तो किताबें हैं और न ही वे होमवर्क पूरा कर पा रहे हैं। इससे न केवल सिलेबस अधूरा रह जाएगा, बल्कि परीक्षाओं पर भी गंभीर असर पड़ेगा।

 “बिना किताबों के कैसे बनेगा 'विकसित दिल्ली' और 'विश्व गुरु'? ”

DYFI ने दिल्ली सरकार और शिक्षा मंत्री आशीष सूद पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि सरकार केवल वादे कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं हो रहा।

नेताओं ने कहा,“पहले 20 अप्रैल तक किताबें देने का वादा किया गया, फिर 30 अप्रैल की नई तारीख दे दी गई। यह ‘तारीख पर तारीख’ का खेल बच्चों के भविष्य के साथ मजाक है।”

DYFI के राज्य सचिव अमन सैनी ने इसे “शिक्षा विरोधी रवैया” बताते हुए कहा कि सरकार जानबूझकर सरकारी स्कूलों को कमजोर कर निजीकरण का रास्ता खोलना चाहती है। उन्होंने सवाल उठाया, “जब सरकार को पता था कि सत्र 1 अप्रैल से शुरू होना है, तो किताबों की व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई? क्या बिना किताबों के ‘विकसित दिल्ली’ और ‘विश्व गुरु’ बनने का सपना पूरा होगा?”

सरकार पर निजीकरण को बढ़ावा देने का आरोप लगते हुए  DYFI और अन्य वक्ताओं ने कहा कि सरकार एक ओर “विश्व स्तरीय शिक्षा” के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।

संगठन का कहना है कि यह स्थिति कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी नीति का हिस्सा है, जिसके तहत सरकारी शिक्षा व्यवस्था को कमजोर कर निजी स्कूलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। DYFI ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सभी छात्रों को किताबें उपलब्ध नहीं कराई गईं, तो पूरे दिल्ली में छात्रों और अभिभावकों के साथ मिलकर व्यापक आंदोलन चलाया जाएगा।

हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को लगाई फटकार !

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस सचिन दत्ता ने 'सोशल जूरिस्ट' द्वारा दायर एक याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में GNCTD के शिक्षा सचिव के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई है, क्योंकि उन्होंने दिल्ली सरकारी स्कूलों के छात्रों को समय पर पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने के संबंध में कोर्ट के पिछले निर्देशों का पालन नहीं किया है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अशोक अग्रवाल ने दलील दी कि हाई कोर्ट के सामने स्पष्ट आश्वासन दिए जाने के बावजूद, कक्षा 1 से 8 तक पढ़ने वाले लाखों छात्रों को शैक्षणिक सत्र 2026-27 शुरू होने के बाद भी पाठ्यपुस्तकें नहीं मिली हैं। कोर्ट ने सरकारी वकील को स्कूल जाने वाले बच्चों पर असर डालने वाली इस गंभीर चूक के लिए फटकार लगाई और किताबों के वितरण में हुई देरी पर सवाल उठाया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने शिक्षा विभाग के संबंधित अधिकारी को नोटिस जारी किया और सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने दलील दी कि 1 अप्रैल से सत्र शुरू होने के बावजूद कक्षा 1 से 8 तक के लाखों छात्र अब भी पाठ्यपुस्तकों से वंचित हैं, जिससे उनकी पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

सरकार का पक्ष: “जल्द पूरा होगा वितरण”

अदालत में दिल्ली सरकार की ओर से बताया गया कि अब तक लगभग 10 लाख छात्रों को किताबें वितरित की जा चुकी हैं, जबकि शेष छात्रों को भी अगले कुछ दिनों में किताबें मिल जाएंगी। सरकार ने यह भी कहा कि टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और वितरण कार्य तेज गति से जारी है।

सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि गर्मी की छुट्टियों से पहले सभी छात्रों को किताबें उपलब्ध करा दी जाएंगी।

अदालत ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए अधिकारियों से एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा और मामले की अगली सुनवाई सितंबर 2026 के लिए निर्धारित की।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि अदालत पहले ही निर्देश दे चुकी है कि शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले छात्रों को किताबें, कॉपियां और अन्य जरूरी सामग्री उपलब्ध करा दी जानी चाहिए। इसके बावजूद इस वर्ष भी देरी होना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने दिल्ली सरकार के शिक्षा मॉडल पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर सरकार शिक्षा के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का प्रचार करती रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर बुनियादी जरूरतों की कमी सामने आ रही है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्राथमिक स्तर पर पाठ्यपुस्तकों की अनुपलब्धता बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, जिसका असर लंबे समय तक पड़ सकता है।

आगे क्या?

एक ओर DYFI जैसे संगठन इस मुद्दे को लेकर सड़कों पर आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अदालत ने भी सरकार को समयबद्ध तरीके से समस्या का समाधान करने के निर्देश दिए हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार अपने आश्वासन के अनुसार गर्मी की छुट्टियों से पहले सभी छात्रों तक किताबें पहुंचा पाती है या नहीं। फिलहाल, दिल्ली के हजारों छात्रों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है “बिना किताबों के पढ़ाई कैसे होगी?”

 

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