नई दुनिया: चिप युद्ध से रेअर अर्थ्स युद्ध तक

प्रौद्योगिकी युद्ध की दुनिया अब विभाजित होकर चिप्स से, अपेक्षाकृत कम जानकारी के और उससे भी बढक़र कम समझ में आने वाले मैदान, रेअर अर्थ्स (Rare Earth) की ओर बढ़ गयी है।
जो लोग रसायन विज्ञान से तथा पीरियोडिक टेबल से अपरिचित हैं, उनके लिए तो रेअर अर्थ्स किन्हीं ऐसे रहस्यमय तत्वों जैसे लगते हैं, जो अचानक ही देशों के बीच तकनीकी लड़ाई का नया मैदान बन गए हैं। अब ही हमें इसका एहसास हो रहा है कि रेअर अर्थ्स अब हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुके भांति-भांति के उपकरणों के लिए ही अपरिहार्य नहीं हैं, नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा (renewable energy) प्रौद्योगिकियों का आधार भी बनाते हैं।
कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एडम टोज़ (Prof. Adam Tooze) के अनुसार, अगर खनिज ईंधन औद्योगिक क्रांति लाए थे, जिसका नेतृत्व पश्चिम कर रहा था, तो हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण का नेतृत्व साफ तौर पर एशिया कर रहा है और चीन इसमें विश्व नेता की हैसियत में है।
रेअर अर्थ्स और उन पर नियंत्रण
बहरहाल, रेअर अर्थ्स सिर्फ अक्षय ऊर्जा के लिए आधार ही मुहैया नहीं कराते हैं, बल्कि भांति-भांति के एप्लीकेशनों के लिए भी अपरिहार्य हैं, खासतौर पर इलेक्ट्रोमैग्नेटों के उत्पादन के लिए। इस तरह के इलेक्ट्रोमैग्नेट हमारे मोबाइल फोनों में, बिजली से चलने वाले वाहनों में, सैन्य एप्लीकेशनों में और हमारे रोजमर्रा के इस्तेमाल के अनेक उपकरणों में लगाए जाते हैं। हैरानी की बात नहीं है कि ये चीन के खिलाफ अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे प्रौद्योगिकीय तथा आर्थिक युद्ध में भी प्रवेश कर गए हैं। अमेरिका को साफ तौर पर चिप युद्ध में बढ़त हासिल है। ऐसा इसलिए है कि उसे, अधुनातम लिथोग्राफिक औजारों की प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण हासिल है। लेकिन, ऊर्जा युद्धों के मामले में और खासतौर पर अक्षय ऊर्जा तथा रेअर अर्थ्स पर लड़े जा रहे युद्ध में, परिदृश्य बहुत ही भिन्न है।
जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं, डच कंपनी एएसएमएल जिन अल्ट्रावाइलेट प्रकाश स्रोतों का इस्तेमाल करती है, अमेरिकी पेंटेंटों के अंतर्गत आते हैं और यह उन्हें अमेरिकी सरकार के कानूनों के आधीन बना देता है। एएसएमएल, लिथोग्राफिक औजारों की अग्रणी विनिर्माता है और एक्स्ट्रीम अल्ट्रावाइलेट (ईयूवी) लिथोग्राफिक मशीनों में उसकी इजारेदारी है। अगर पश्चिमी कंपनियों को चिप युद्धों में स्पष्ट बढ़त हासिल है, तो रेअर अर्थ्स की समूची सप्लाई चेन में चीनियों को लगभग इजारेदारी हासिल नजर आती है और इसमें हाई एफीशिएंसी मैग्नेटिक मोटरों का उत्पादन भी शामिल है। ये मोटर अनेकानेक एप्लीकेशनों को चलाती हैं: इलैक्ट्रिक वाहनों से लेकर, पवन टर्बाइनों, एअर इंजनों तथा मोबाइल फोन आदि तक।
जिस तरह अमेरिका ने चीन के लिए चिपों के निर्यात पर सीधे-सीधे पाबंदी नहीं लगायी थी बल्कि उन पर आयात नियंत्रण लागू कर दिए थे, वैसा ही चीन ने किया है। चीन ने कुछ खास प्रकार के रेअर अर्थ्स उत्पादों के निर्यात के लिए निर्यात रजिस्ट्रेशन लाइसेंसिंग की विस्तृत शर्तें लगा दी हैं। इस तरह चीन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रौद्योगिकी युद्धों में पत्ते सिर्फ पश्चिम के पास ही नहीं हैं, उनके पास भी कुछ बड़े पत्ते हैं।
रेअर अर्थ्स क्या हैं?
आइए, अब सीधे इस पर आते हैं कि रेअर अर्थ्स हैं क्या और क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं। रेअर अर्थ्स पीरिओडिक टेबल के 17 तत्वों के एक समूह का नाम है, जिनमें से 6 तत्वों को चीन ने निर्बंधित या रेस्ट्रिक्टेड की श्रेणी में डाल दिया है। अमेरिकी प्रौद्योगिकीय निजाम की ही तरह, इस श्रेणी में आने वाले चीनी उत्पादों के लिए यह कैद है कि कोई भी पार्टी जो चीन से इस तरह की निर्बंधित सामग्री का निर्यात करना चाहती हो, उसे इस सामग्री का फौरी उपयोग करने वाली और अंतिम उपयोग करने वाली पार्टियों के संंबंध में भी विस्तृत दस्तावेजी ब्यौरे पेश करने होंगे। नियोडाइमियम आइरन बोरोन (एनइ-एफइ-बी) इलेक्ट्रोमैग्नेटों का आयात खास दबाव का बिंदु बना हुआ है। इन नियोडाइमियम मैग्नेटों में दो रेअर अर्थ तत्वों का उपयोग होता है--डिस्प्रोसियम और टर्बियम--जोकि रेस्ट्रिक्टेड लिस्ट में हैं और उनका करीब 100 फीसद उत्पादन चीन के हाथ में है। डिस्प्रोसियम और टर्बियम का उपयोग कर बनाए गए नियोडाइमियम मैग्नेटों का चुंबकीय प्रदर्शन बेहतर होता है, ये मैग्नेट हल्के तथा मजबूत होते हैं, उन्हें किसी भी आकार तथा शक्ल में ढाला जा सकता है और ये कहीं ऊंचे तापमानों का सामना कर सकते हैं।
तो ये तत्व इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं और किन उद्योगों के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं? जो चीनी इजारेदारी इस समय खबरों में है, हाई एफीशिएंसी इलेक्ट्रोमैग्नेटों के उत्पादन पर इजारेदारी है, जिनकी अक्षय ऊर्जा उपकरणों, मोबाइल फोनों आदि तथा सैन्य क्षेत्र से जुड़े अनेक उपकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इलेक्ट्रिक मोटर की कार्यकुशलता इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (ईवीज़), पवन टर्बाइनों जैसे एप्लीकेशनों के लिए महत्वपूर्ण होती है। हमारे सेल फोन में मोटर की कार्यकुशलता ही यह तय करती है कि दोबारा चार्ज करने की जरूरत पडऩे से पहले, उपकरण कितने समय तक काम कर सकता है। पवन टर्बाइन या इलेक्ट्रिक वाहन के मामले में मैग्नेट की कार्यकुशलता ही, उपकरण की कार्यकुशलता तय करती है और इसलिए उपयोक्ता के लिए उसका बहुत महत्व होता है।
इसलिए, सस्ते तथा कार्यकुशलतापूर्ण मैग्नेट, अक्षय ऊर्जा और मोबाइल फोन बाजारों के विस्तार के लिए, बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।
पर बात सिर्फ इसी पर खत्म नहीं हो जाती है। इस तरह के कार्यकुशल मैग्नेट हवाई-अंतरिक्ष उद्योग, ड्रोनों तथा मिसाइलों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। अगर चिप करीब-करीब हरेक आधुनिक उपकरण में प्रवेश कर चुकी हैं, तो रेअर अर्थ्स का उपयोग करने वाले पुर्जे भी करीब हरेक उपकरण में प्रवेश कर चुके हैं।
चीन की बढ़त
तो क्या चीन को रेअर अर्थ्स के स्रोतों पर लगभग इजारेदारी हासिल है? नहीं, चीन को रेअर अर्थ्स के स्रोतों पर इजारेदारी हासिल नहीं है। हां! इनके वैश्विक सुरक्षित भंडार का करीब 44 फीसद चीन के पास है, जिसके बाद 22 फीसद वियतनाम के पास है, 21-21 फीसद ब्राजील तथा रूस के पास है, 6.9 फीसद भारत के पास है और 5.7 फीसद आस्ट्रोलिया के पास है, बाकी अन्य के पास। चीन के पास लगभग वैश्विक इजारेदारी है, अन्य सामग्रियों से रेअर अर्थ्स सामग्रियों के पृथक्करण में और रेअर अर्थ्स सामग्रियों के आधार पर बने ऐसे भांति-भांति के उत्पादों की आपूर्ति शृंखला में, जिन उत्पादों की अनेक औद्योगिक तथा सैन्य एप्लीकेशनों या उपयोगों में केंद्रीय भूमिका है।
वैसे इन्हें रेअर या दुर्लभ कहा तो जाता है, लेकिन वास्तव में ये सामग्रियां धरती की सतह पर काफी व्यापक पैमाने पर मिलती हैं। समस्या यह है कि ये बहुत ही विरल रूप में और अक्सर रेडियोधर्मी तत्वों के साथ मिश्रित रूप में पायी जाती हैं। उदाहरण के रूप में भारत में मोनाजाइट रेत, जिसमें रेडियोधर्मी तत्व थोरियम भी मिलता है। इंडियन रेअर अर्थ लि0 (आआरईएल) की इस क्षेत्र में विशेषज्ञता का लंबा इतिहास है। लेकिन, इसका ध्यान मुख्य रूप से थोरियम के उत्पादन पर रहा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि आइआरईएल ने रेअर अर्थ्स पर, जो मोनाजाइट रेत में थोरियम के साथ मिश्रित पाए जाते हैं, अपने आप में महत्वपूर्ण उत्पाद के रूप में ध्यान ही नहीं दिया है, जबकि अक्षय ऊर्जा के दौर में इस सामग्री का महत्व बहुत बढ़ गया है।
चीन ने अपने रेअर अर्थ्स क्षेत्र का निर्माण कैसे किया और कैसे कुछ रेअर अर्थ उत्पादों के मामले में लगभग इजारेदारी की हैसियत हासिल कर ली, जबकि इससे संबंधित कच्चे माल व्यापक रूप से उपलब्ध हैं और आस्ट्रेलिया में भी उपलब्ध हैं, जो अमेरिका का बहुत ही घनिष्ठ सहयोगी है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसका रक्षा-साझीदार है?
1950 के दशक से लेकर 1980 के दशक तक, अमेरिका ही रेअर अर्थ्स के मामले में अग्रणी उत्पादक था। उस जमाने में रेअर अर्थ्स के भांति-भांति के प्रयोग हुआ करते थे--रंगीन टेलीविजन से लेकर कांच की रंगाई, आइल क्रेकिंग यानी तेल का अपघटन, आदि। आज रेअर अर्थ सामग्रियां भांति-भांति के उद्योगों के लिए अत्यधिक आवश्यक हैं--पवन टर्बाइनों से, इलेक्ट्रिक वाहनों, विमानों, रोबोटिक्स, आदि तक। सैन्य क्षेत्र में इनका उपयोग मिसाइलों, लेसरों, टैंक आदि वाहन चालित प्रणालियों और सैन्य संचार में होता है। जहां चीन रेअर अर्थ्स की कुल मात्रा में से करीब 60 फीसद का खुद उत्पादन करता है, वह दुनिया भर में इस सामग्री के करीब 90 फीसद का प्रसंस्करण या प्रोसेसिंग करता है। आशय यह कि वह म्यांमार, आस्ट्रेलिया, वियतनाम आदि देशों में उत्पादित रेअर अर्थ सामग्रियों का भी प्रसंस्करण करता है। और जहां तक भारी हैवी अर्थ्स का सवाल है, जिनका उपयोग मिसाल के तौर पर उन चुम्बकों या मैग्नेटों में होता है, जिनका हम पीछे जिक्र कर आए हैं, उनके मामले में चीन की इजारेदारी और भी ज्यादा है। यह इजारेदारी 99.9 फीसद न भी सही, 99 फीसद से ऊपर जरूर है।
अमेरिका की नस दबी
ये रेअर अर्थ तत्व अमरीकी सेना के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं? सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के अनुसार, जो कि एक अमरीकी थिंक टैंक है, ‘‘रेअर अर्थ तत्व या आरईई अनेक प्रतिरक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण हैं, जिनमें एफ-35 लड़ाकू जेट, वर्जीनिया तथा कोलंबिया क्लास की पनडुब्बियां, टॉमहाक मिसाइलें, राडार प्रणालियां, प्रिडेटर मानवरहित एरियल व्हीकल और स्मार्ट बमों की ज्वाइंट डाइरेक्ट अटैक म्यूनिशन शृंखला शामिल हैं।
मिसाल के तौर पर एफ-35 लड़ाकू जैट में 900 पाउंड से ज्यादा आरईई लगते हैं। एक अर्ल बर्क क्लास डीडीजी-51 विध्वंसक के लिए करीब 5,200 पाउंड की जरूरत होती है, जबकि वर्जीनिया क्लास पनडुब्बी में करीब 9,200 पाउंड आरईई लगता है।’’
अगर हम पोतों, पनडुब्बियों तथा विमानों जैसे पूंजी उपकरणों को छोड़ भी दें और सैन्य उपभोग सामग्री या कंज्यूमेबल्स यानी मिसाइलों, मानवरहित एरियल व्हीकल्प तथा स्मार्ट बमों आदि को ही देखें तो, फिलहाल न तो अमेरिका के पास और न ही उसके सहयोगियों के पास, भारी रेअर अर्थ मैग्नेट बनाने के लिए कोई सुविधाएं हैं। इसका अमरीकी कारखाना अगर 2025 के आखिर तक चालू भी हो जाए, तब भी चीन 2018 में जितना इन मैग्नेटों का उत्पादन कर रहा था, उसका 1 फीसद ही बना पाएगा! वैसे तो आस्ट्रेलिया की लाइनास रेअर अर्थ्स, चीन के बाद रेअर अर्थ्स की सबसे बड़ी उत्पादक है, फिर भी उसे अपनी इंटरमीडिएट रेअर अर्थ सामग्रियां, अंतिम रूप से प्रसंस्करण के लिए चीन ही भेजनी पड़ती हैं।
बेशक, कोई भी प्रौद्योगिकी, चाहे चिप की हो या रेअर अर्थ्स की, हमेशा के लिए किसी एक राष्ट्र-राज्य की इजारेदारी नहीं बनी रह सकती है। अमेरिका, चीन तथा भारत जैसी महाद्वीपीय आकार की अर्थव्यस्थाओं के लिए, न तो चिप और न ही रेअर अर्थ मैग्नेट, ज्यादा समय तक प्रौद्योगिकीय इजारेदारी रह सकते हैं। फिर भी, चिप या मैग्नेटों तक पहुंच पर लगी पाबंदिया, किसी देश की गति को कुछ समय के लिए धीमा जरूर कर सकती हैं और इस या उस देश को थोड़े समय के लिए बढ़त जरूर दिला सकती हैं। लेकिन, ज्यादा समय के लिए नहीं और हरेक उत्पाद या देश के लिए तो निश्चत रूप से नहीं।
मिसाल के तौर पर भारत के खिलाफ अमेरिका तथा उसके सहयोगियों ने जो नाभिकीय शक्ति नकार तथा मिसाइल नकार की व्यवस्थाएं थोपे रखी थीं, पहले भी किसी काम की साबित नहीं हुई थीं। यह मानना कि इस तरह की व्यवस्थाएं आज या निकट भविष्य के लिए काम करेंगी, परी कथाओं में विश्वास करने जैसी बात है।
फिर भी जैसा कि केन्स ने अर्थव्यवस्था को लेकर दीर्घावधि विचार के संबंध में अपने प्रसिद्ध उद्धरण में कहा था: ‘‘लेकिन, वर्तमान मामलों के सिलसिले में यह दीर्घावधि (की बात) एक भ्रामक मार्गदर्शक है। दीर्घावधि में तो हम सब मर चुके होते हैं।’’ आज रणनीतिक मुद्दा यह नहीं है कि हमारे भविष्य को कौन नियंत्रित करेगा बल्कि यह है कि आज कौन नियंत्रित कर रहा है। यही है वह वृहत्तर रणनीतिक युद्ध जो आज चिप तथा ऊर्जा लड़ाइयों में लड़ा जा रहा है।
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